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दवाओं की एमआरपी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, जनहित याचिका पर 5 अक्टूबर को अगली सुनवाई

September 29, 2026 · Ashish Bajpai · 1 मिनट पढ़ें

नई दिल्ली, 29 सितंबर (आईएएनएस)। दवाओं की कीमत और एमआरपी तय करने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान पिटीशनर और वकील किशन चंद जैन ने मामले…

नई दिल्ली, 29 सितंबर (आईएएनएस)। दवाओं की कीमत और एमआरपी तय करने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान पिटीशनर और वकील किशन चंद जैन ने मामले से जुड़े प्रमुख बिंदुओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह जनहित याचिका वर्ष 2003 में दायर की गई थी, जिसमें जेनेरिक दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन और दवाओं की कीमत निर्धारित करने से जुड़े मुद्दे उठाए गए थे

किशन चंद जैन ने बताया कि जनहित याचिका में दो मुख्य मुद्दे उठाए गए थे। पहला, प्रत्येक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर द्वारा जेनेरिक मेडिसिन लिखे जाने का विषय था। दूसरा मुद्दा दवाओं की एमआरपी और उनकी कीमत तय करने की प्रक्रिया से संबंधित था। उन्होंने बताया कि ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) 2013 के तहत दवाओं को शेड्यूल और नॉन-शेड्यूल कैटेगरी में बांटा गया है। शेड्यूल दवाओं की कीमत निर्धारित करने का काम नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी करती है और इसमें रिटेलर के लिए 16 प्रतिशत मार्जिन का प्रावधान है

जैन ने कहा कि बाजार में बड़ी संख्या में दवाएं नॉन-शेड्यूल कैटेगरी में आती हैं और इनकी कीमत निर्धारित करने पर उसी तरह का नियंत्रण नहीं है। उन्होंने दावा किया कि निर्माता अपनी दवाओं की एमआरपी काफी अधिक तय कर सकते हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई दवा बाजार में 10 रुपए में उपलब्ध है तो उसकी एमआरपी 100 रुपए तक रखी जा सकती है। इससे खास तौर पर उन अस्पतालों में मरीजों को आर्थिक नुकसान होता है, जहां एमआरपी के आधार पर बिलिंग की जाती है। सरकार की ओर से किसी तरह का रीइंबर्समेंट होने की स्थिति में भी अधिक भुगतान का असर पड़ सकता है

किशन चंद जैन ने बताया कि सुनवाई के दौरान कोर्ट की ओर से यह ऑब्जर्वेशन सामने आया कि रिटेलर के लिए कीमत पर रिटेलर का 16 प्रतिशत मार्जिन जोड़कर एमआरपी निर्धारित करने की व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए। दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने का मुद्दा लंबे समय से अदालत के सामने है और सरकार की ओर से भी इस दिशा में प्रयास किए जाते रहे हैं

जैन ने बताया कि सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से कहा गया कि वह प्रस्ताव का विरोध नहीं कर रही है, लेकिन अधिकारियों से चर्चा कर ऐसा रास्ता निकालना चाहती है जिससे दवाओं की एमआरपी उचित तरीके से निर्धारित की जा सके। कोर्ट ने मामले को आवश्यक बताते हुए इसे जल्द तय करने की बात कही है। मामले में अगली सुनवाई के लिए 5 अक्टूबर की तारीख निर्धारित की गई है

किशन चंद जैन ने बताया कि उन्होंने अदालत के समक्ष यह तर्क भी रखा कि दवा शेड्यूल हो या नॉन-शेड्यूल, दोनों को आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आवश्यक वस्तु माना जाना चाहिए। उन्होंने मेडिकल डिवाइसेज का भी उल्लेख करते हुए कहा कि ग्लव्स, इंजेक्शन और अन्य मेडिकल सामान भी आवश्यक वस्तुओं के दायरे में आते हैं। अदालत ने इस तर्क पर सहमति जताई कि यदि सभी दवाएं आवश्यक वस्तु अधिनियम की परिधि में आती हैं तो फिर शेड्यूल और नॉन-शेड्यूल दवाओं के बीच कीमत नियंत्रण को लेकर अलग-अलग व्यवस्था का आधार भी स्पष्ट होना चाहिए

अब मामले में 5 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई में दवाओं की एमआरपी निर्धारित करने की व्यवस्था और कीमत नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर आगे की सुनवाई होगी

पीएसके

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी

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Source: NewsNation TV

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