अयोध्या: उत्तर प्रदेश की मिल्कीपुर विधानसभा सीट अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ही प्रदेश की सबसे चर्चित सियासी सीटों में शामिल हो गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या सीट पर बीजेपी की हार के बाद मिल्कीपुर उपचुनाव को राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई के तौर पर देखा गया था। फरवरी 2025 में हुए उपचुनाव में बीजेपी के चंद्रभानु पासवान ने समाजवादी पार्टी के अजीत प्रसाद को 61,710 वोटों के बड़े अंतर से हराकर पार्टी को मजबूत बढ़त दिलाई। अब नजर 2027 के विधानसभा चुनाव पर है, जहां बीजेपी अपनी इस बढ़त को कायम रखने की कोशिश करेगी, जबकि समाजवादी पार्टी खोया हुआ सियासी आधार वापस पाने के लिए रणनीति तैयार करेगी।
मिल्कीपुर उपचुनाव में बीजेपी की बड़ी जीत ने पार्टी को संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बढ़त दी है। मौजूदा विधायक, मजबूत बूथ संगठन और उपचुनाव में मिली बड़ी जीत बीजेपी के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त का काम कर सकती है। हालांकि 2027 का चुनाव उपचुनाव से अलग होगा और इसमें स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार की छवि, सरकार के कामकाज और व्यापक सामाजिक समीकरणों की भी अहम भूमिका होगी।
मिल्कीपुर की सियासत में दलित वोट बैंक, खासकर पासी मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। उपलब्ध राजनीतिक आकलनों के मुताबिक यहां करीब 55 हजार पासी मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। बीजेपी ने चंद्रभानु पासवान को उम्मीदवार बनाकर दलित वोटों में अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश की थी और उपचुनाव में पार्टी को इसका फायदा भी मिला।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के लिए यादव और मुस्लिम मतदाता परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण आधार माने जाते हैं। करीब 55 हजार यादव और 30 हजार मुस्लिम मतदाताओं के अलावा ब्राह्मण, राजपूत और गैर-पासी दलित मतदाताओं का रुख भी चुनावी परिणाम पर असर डाल सकता है।
2027 में समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार से आगे बढ़कर दलित और अन्य पिछड़े वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करने की होगी। पार्टी की PDA रणनीति के लिए मिल्कीपुर एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन सकती है।
उम्मीदवार का चयन भी यहां निर्णायक भूमिका निभा सकता है। अगर विपक्षी खेमे से कोई मजबूत दलित उम्मीदवार मैदान में उतरता है, तो वोटों का विभाजन मुकाबले को और रोचक बना सकता है। बसपा या आजाद समाज पार्टी की चुनावी सक्रियता भी इस सीट के समीकरण को प्रभावित कर सकती है।
मिल्कीपुर का चुनाव सिर्फ जातीय गणित तक सीमित नहीं रहेगा। स्थानीय विकास, रोजगार, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और सरकारी योजनाओं का असर भी मतदाताओं के रुख को प्रभावित कर सकता है। इसके साथ ही दोनों प्रमुख दलों की बूथ स्तर की रणनीति और प्रत्याशी की स्थानीय पकड़ भी अहम होगी।
फिलहाल मिल्कीपुर में बीजेपी के पास 2025 के उपचुनाव की बड़ी जीत का आत्मविश्वास है, जबकि समाजवादी पार्टी के सामने वापसी की चुनौती है। 2027 की असली लड़ाई इस बात पर निर्भर करेगी कि कौन पार्टी पासी और अन्य दलित मतदाताओं के साथ व्यापक सामाजिक गठजोड़ बनाने में सफल होती है।
मिल्कीपुर का सियासी मुकाबला इसलिए भी खास होगा क्योंकि यह सिर्फ एक विधानसभा सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि अयोध्या के राजनीतिक माहौल और बीजेपी बनाम SP के सामाजिक समीकरणों की भी बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
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Source: Filmitics

