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महाराष्ट्र: इस ज़िले में छह महीने में 29 पुरुषों ने की आत्महत्या, क्या शादी न हो पाना है असली वजह?

September 1, 2026 · Ashish Bajpai · 1 मिनट पढ़ें

महाराष्ट्र पुलिस के आंकड़ों से पता चलता है कि 1 जनवरी से 30 जून, 2026 के बीच छह महीनों में जलगाँव ज़िले में 383 पुरुषों ने आत्महत्या की है

पुलिस जांच में इन आत्महत्याओं के पीछे नशा, डिप्रेशन, पारिवारिक समस्याएं और क़र्ज़ जैसी कई वजहें सामने आई हैं

पुलिस का दावा है कि इनमें से 29 मामलों में शादी के लिए रिश्ता न मिलना आत्महत्या की वजह थी

इन आंकड़ों के सामने आने के बाद, जलगाँव में नौजवानों को दुल्हन नहीं मिल पाने की ख़ूब चर्चा हो रही है

(आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुज़र रहे हैं तो भारत सरकार की ‘जीवन आस्था’ हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.)

जलगाँव के गांवों में जाकर देखने पर एक जटिल तस्वीर उभरती है. शादी की चाह रखने वाले नौजवानों, उनके परिवारों, महिलाओं और इस विषय पर रिसर्च करने वालों से बातचीत से यह साफ़ हो जाता है कि यह मामला सीधा-सादा नहीं है

जलगाँव में शादी अब सिर्फ़ दो लोगों के बीच का फ़ैसला नहीं रह गई है. यह रोज़गार, ज़मीन के मालिकाना हक़, जाति, पारिवारिक ज़िम्मेदारियों, पलायन, महिलाओं की बदलती उम्मीदों और पुरुषों पर सामाजिक दबावों से जुड़ा एक जटिल जाल बन गई है

‘शादी सही उम्र में होनी चाहिए’

जलगाँव में मेरी मुलाक़ात 30 साल के प्रोफ़ेसर विशाल पाटिल से हुई, जिन्होंने शादी के बारे में ऐसी बात कही जो कई अन्य नौजवानों के अनुभवों से मेल खाती है

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वह कहते हैं, “मेरे माता-पिता भी चाहते थे कि मैं शादी कर लूं. हालांकि, मैं इसे थोड़ा टाल रहा हूं. मैं अपने करियर पर ध्यान देना चाहता हूं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहता हूं. मैं शादी तभी करूंगा जब मुझे ऐसी महिला मिलेगी जो मुझे समझे और मेरे लिए सही हो.”

विशाल कहते हैं कि समाज ने शादी के लिए एक ख़ास उम्र तय कर रखी है

विशाल के शब्दों में, “भारतीय समाज में यह उम्मीद की जाती है कि शादी 24-26 साल की उम्र तक, या कम से कम 28-29 साल तक हो जानी चाहिए. एक बार जब कोई 30 साल की उम्र पार कर लेता है, तो लोग उसे अलग नज़र से देखने लगते हैं. यह दबाव सिर्फ़ शादी न होने का नहीं है. धीरे-धीरे यह भावना भी पैदा हो सकती है कि उस व्यक्ति में कोई कमी है क्योंकि उसने शादी नहीं की है.”

मेंटल हेल्थ काउंसलर मुकेश के अनुसार, जब शादी को स्टेटस और सफलता से जोड़ा जाता है, तो कुछ युवाओं को अविवाहित रहने पर निजी विफलता जैसा महसूस हो सकता है

जलगाँव पुलिस के आंकड़ों को देखते समय इस संदर्भ को ध्यान में रखना ज़रूरी है

हालांकि आत्महत्या के 29 मामलों में शादी न होने को एक वजह बताया गया है, लेकिन पुलिस इन घटनाओं के पीछे इसे ही एकमात्र कारण नहीं मानती है

नशा, डिप्रेशन, पारिवारिक तनाव और क़र्ज़ जैसी दूसरी वजहें भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं

हालांकि, अगर अविवाहित रहने के असल कारणों को समझा जाए, तो इन आंकड़ों का एक और पहलू सामने आता है

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‘महिलाओं से ज़्यादा हैं पुरुष’

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महाराष्ट्र के आंकड़े इस मुद्दे पर एक अलग नज़रिए से जानकारी देते हैं

साल 2019-21 के नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफ़एच-5) के डेटा के अनुसार, महाराष्ट्र में 20 से 49 साल की उम्र की लगभग 11 प्रतिशत महिलाएं अविवाहित थीं, जबकि पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा लगभग 30 प्रतिशत था

इससे पता चलता है कि राज्य में महिलाओं की तुलना में अविवाहित पुरुषों का अनुपात काफ़ी ज़्यादा है. लेकिन क्या महिलाओं की कम संख्या ही इस अंतर का एकमात्र कारण है

जलगाँव के कौस्तुभ पोतदार का मामला इस समस्या की गंभीरता को दिखाता है

बी. फ़ार्मा की डिग्री पूरी करने के बाद, वह नासिक की एक प्राइवेट कंपनी में काम कर रहे थे. माँ के गुज़रने के बाद, परिवार उनकी शादी के लिए सही लड़की की तलाश करने लगा

उनके परिवार के अनुसार, उन्हें कई जगहों से इसलिए मनाही का सामना करना पड़ा क्योंकि उनके पास सरकारी नौकरी नहीं थी और ना ही अपना घर था

फ़रवरी 2026 में उन्होंने आत्महत्या कर ली

कौस्तुभ का अनुभव यह निष्कर्ष निकालने के लिए काफ़ी नहीं है कि हर बार मनाही इन्हीं कारणों से होती है. लेकिन उनकी कहानी शादी के मामलों में आर्थिक स्थिरता और पारिवारिक ढांचे के महत्व की ओर ध्यान ज़रूर खींचती है

‘पक्का मकान बन गया तो दुल्हन भी मिल जाएगी’

जलगाँव में मिली एक बुज़ुर्ग महिला ने मुझे बताया कि उनका बेटा अब 40 साल का हो चुका है. वह कई सालों से उसके लिए दुल्हन ढूंढ रही हैं

संभावित दुल्हनों से बार-बार मनाही का सामना करने के बाद, अब वह खुद एक पक्का मकान बनवा रही हैं. उन्हें उम्मीद है कि ‘एक बार घर बन जाएगा, तो उसे दुल्हन मिल जाएगी.’

उनकी बातों में बेटे के अविवाहित रहने की चिंता तो थी ही, लेकिन उससे भी ज़्यादा लाचारी का भाव था क्योंकि वर्षों की कोशिश के बावजूद हालात बिल्कुल नहीं बदल रहे हैं

ग्रामीण महाराष्ट्र को लेकर मयूर कुडुपले और जोएल कैबालियन की रिसर्च में भी यह बदलाव साफ़ दिखता है. उनके अध्ययन के अनुसार, ज़मीन, शिक्षा, जाति और उम्र ग्रामीण शादी-ब्याह की व्यवस्था में जीवनसाथी चुनने पर असर डालने वाले मुख्य कारक हैं

मयूर कुडुपले कहते हैं, “एक समय था जब लड़की के पिता यह देखते थे कि दूल्हे के पास कितनी ज़मीन है. अब, ज़मीन होने से ज़्यादा ज़रूरी यह बात हो गई है कि उसके पास नौकरी है या नहीं.”

उनके मुताबिक, “ग्रामीण अर्थव्यवस्था बदली है, लेकिन इन बदलावों के साथ शादी को लेकर लोगों की उम्मीदें एक जैसी नहीं बदली हैं. ज़मीन का होना सामाजिक और आर्थिक स्थिरता की निशानी हुआ करती थी. अब इसकी जगह नियमित आय, रोज़गार, शहर में रहने की संभावना और अपना घर होने जैसी चीज़ों ने ले ली है.”

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शादी को लेकर उम्मीदें बदल रही हैं

इन सबके बीच, ‘जाति’ अभी भी एक बड़ी रुकावट बनी हुई है

मयूर कुडुपले के अनुसार, “जाति और उप-जाति शादी के बाज़ार में लोगों की पसंद और दायरे को सीमित करती हैं. जब हम होने वाली दुल्हन या दूल्हे की तलाश करते हैं, तो हम अक्सर अपनी ही जाति और उप-जाति के दायरे में ही खोज करते हैं.”

जेंडर इक्वैलिटी ट्रेनर दर्शना पवार जाति-आधारित इस ढांचे से जुड़ी एक और विरोधाभासी बात बताती हैं

वह कहती हैं, “अगर किसी पुरुष को ज़रूरत महसूस हो, तो वह किसी भी जाति की महिला से शादी करने को तैयार हो सकता है. लेकिन क्या उसकी जाति, उसके माता-पिता और रिश्तेदारों को सच में अपनाएगी?”

असल में, शादी के मामलों में जाति ख़त्म नहीं हुई है, बस उसका स्वरूप बदल गया है

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आख़िर महिलाओं की उम्मीदें क्या हैं

जलगाँव में पुरुषों से बात करते समय एक आम शिकायत यह सुनने को मिली कि ‘महिलाओं की अपेक्षाएं बढ़ गई हैं.’

बहुत से लोगों का मानना है कि महिलाएं ऐसा साथी चाहती हैं जो नौकरी करता हो, जिसका शहर में अपना घर हो और जो आर्थिक रूप से स्थिर हो

हालांकि, महिलाओं से बातचीत करने पर कुछ अलग ही तस्वीर सामने आती है. हमने 20-22 साल की एक युवती से शादी और उसकी निजी उम्मीदों के बारे में बात की

लेकिन इंटरव्यू के अगले दिन लड़की के परिवार ने कहा कि इस बातचीत का इस्तेमाल न किया जाए

महिलाओं की उम्मीदें वाक़ई बदली हैं, लेकिन हर किसी के पास उन्हें खुलकर ज़ाहिर करने की आज़ादी नहीं है

दर्शना पवार कहती हैं, “अपने पति से बात कर पाना, उनके साथ बाहर जा पाना और साथ में समय बिता पाना…ऐसी उम्मीद रखना ग़लत नहीं है. ये कोई ‘बढ़ी-चढ़ी’ अपेक्षाएं नहीं, बल्कि बुनियादी और वाजिब इच्छाएं हैं. बस अब इस बारे में जागरूकता बढ़ रही है.”

जलगाँव में जिन पुरुषों से हमने बात की, उनमें से अधितकर शादी न होने के लिए सिर्फ़ महिलाओं को ही ज़िम्मेदार मानते हैं

मयूर कुडुपले की स्टडी में भी ग्रामीण पुरुषों की ओर से महिलाओं की बदलती पसंद को लेकर ऐसी ही शिकायतें सामने आई हैं

हालाँकि, रिसर्च से पता चलता है कि इन बदलावों को सिर्फ़ महिलाओं की अपेक्षाओं में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा सकता

इनके पीछे खेती में गिरावट, बेरोज़गारी, शिक्षा, जाति और सामाजिक रुतबे के बारे में बदलती सोच जैसे कारण भी हैं

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इस सब में पुरुषों की क्या स्थिति है

जलगाँव के गांवों में जब भी हमने शादी की बात छेड़ी पुरुषों का लहजा बदल गया. कुछ तो कैमरे पर बात करने को बिल्कुल तैयार नहीं थे. एक युवक ने मुझसे साफ-साफ कहा, “अगर मैं कैमरे पर अपने बारे में बात करूंगा, तो मुझसे शादी कौन करेगा?”

कई परिवारों ने अब अपने बेटों पर शादी करने का दबाव डालना बंद कर दिया है, क्योंकि सालों की नाकाम कोशिशों के बाद उन्होंने शायद उम्मीद छोड़ दी है

हालांकि, कुछ परिवार अभी भी मकान बनवा रहे हैं, ज़मीन खरीद रहे हैं या अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि उनके बेटों के लिए रिश्ता मिल सके

कई परिवार अब मदद के लिए बिचौलियों और शादी कराने वाले दलालों का सहारा ले रहे हैं

कुछ माता-पिता के अनुसार, शादी तय कराने के नाम पर धोखाधड़ी की घटनाएं भी बढ़ी हैं

कुछ पुरुष जीवनसाथी की तलाश में महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में जाते हैं, जबकि कुछ परिवार दुल्हन पाने के लिए पैसे देने को भी तैयार रहते हैं

जीवनसाथी की तलाश अब रिश्तेदारों के पारंपरिक दायरे से आगे बढ़कर बिचौलियों, पैसों के लेन-देन और दूर-दराज़ के ज़िलों तक पहुंच गई है

कन्या भ्रूण हत्या से लेकर शादी की बदलती व्यवस्था तक

दर्शना पवार के अनुसार, “पिछले कुछ दशकों में बड़े पैमाने पर हुई कन्या भ्रूण हत्याओं का असर आज उन पुरुषों की पीढ़ी में दिखाई दे रहा है जो शादी की उम्र के हैं.”

वह कहती हैं, “30-35 साल के जो पुरुष अभी जीवनसाथी नहीं ढूंढ पा रहे हैं, उनका जन्म उस समय हुआ था जब बड़ी संख्या में कन्या भ्रूणों को नष्ट किया जा रहा था. हालांकि, लड़कियों की संख्या में कमी का मतलब यह नहीं है कि शादी के बारे में अंतिम फैसला लेने का अधिकार अब महिलाओं के पास है.”

मयूर कुडुपले और जोएल कैबालियन के किए अध्ययन के अनुसार, महिलाओं की फ़ैसले लेने की क्षमता कुछ हद तक बढ़ी है फिर भी यह परिवार, जाति और सामाजिक दबावों के दायरे में ही काम करती है

रोज़गार, आय, जाति, परिवार की उम्मीदों और शादी की बदलती व्यवस्था जैसे कारणों के बीच, पुरुष भी अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं

विशाल पाटिल कहते हैं, “शादी ही ज़िंदगी में सब कुछ नहीं है.”

महत्वपूर्ण नोट

मानसिक बीमारियों का इलाज दवा और थेरेपी से किया जा सकता है. इसके लिए आपको मनोचिकित्सक की मदद लेनी चाहिए

अगर आप या आपका कोई परिचित इस प्रकार की मानसिक बीमारियों के लक्षणों का अनुभव कर रहा है, तो आप सहायता के लिए इस हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क कर सकते हैं

हितगुज हेल्पलाइन, मुंबई – 022-24131212

सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय – 1800-599-0019 (13 भाषाओं में उपलब्ध)

मानव व्यवहार एवं संबद्ध विज्ञान संस्थान – 9868396824, 9868396841, 011-22574820

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान – 080-26995000

विद्यासागर इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड एलाइड साइंसेज़, 24×7 हेल्पलाइन- 011-2980 2980

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Source: BBC News हिन्दी

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