38 साल पुरानी लड़ाई में महिला को सुप्रीम कोर्ट से न्याय, ‘महिला होने’ के आधार पर नौकरी से इनकार पर IOC को फटकार करीब 38 साल पुराने एक मामले में सुप्रीम कोर्ट न…
38 साल पुरानी लड़ाई में महिला को सुप्रीम कोर्ट से न्याय, ‘महिला होने’ के आधार पर नौकरी से इनकार पर IOC को फटकार करीब 38 साल पुराने एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाते हुए इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें महिला को भारी गैस सिलेंडर उठाने में असमर्थ बताते हुए नौकरी देने से इनकार किया गया था। कोर्ट ने कहा कि केवल महिला होने के आधार पर किसी योग्य उम्मीदवार को नौकरी से वंचित करना उसके आत्मसम्मान के खिलाफ है।
1988 में नौकरी के लिए किया था आवेदन
मामला वर्ष 1988 का है। करनाल स्थित IOC के बॉटलिंग प्लांट में एक महिला ने नौकरी के लिए आवेदन किया था। भर्ती प्रक्रिया में कुल 49 उम्मीदवारों का चयन किया गया था, जिसमें याचिकाकर्ता महिला का नाम भी शामिल था। महिला शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ नौकरी से जुड़े अन्य निर्धारित मानकों पर भी खरी उतरती थीं। इसके बावजूद IOC ने उनकी नियुक्ति नहीं की। महिला को नौकरी नहीं देने के पीछे यह तर्क दिया गया कि गैस सिलेंडर उठाने जैसे भारी काम में महिलाओं को परेशानी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट में IOC ने क्या दलील दी?
मामले की सुनवाई के दौरान IOC की ओर से पेश वकील ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि संभवतः उस समय काम करने का तरीका ऐसा था, जिसमें महिला को दिक्कत हो सकती थी। दलील दी गई कि गैस सिलेंडर उठाना भारी काम था और महिला के लिए यह काम करना मुश्किल हो सकता था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और महिला को केवल उसके लिंग के आधार पर नौकरी से वंचित किए जाने पर कड़ी टिप्पणी की।
SC ने IOC की दलील को किया खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने IOC की दलील को खारिज करते हुए कहा कि महिलाएं घरों में भी गैस सिलेंडर उठाती हैं और जरूरत पड़ने पर उसे बदलती भी हैं। कोर्ट ने कहा कि केवल महिला होने के कारण नियुक्ति से इनकार करना महिलाओं के आत्मसम्मान के खिलाफ है। कोर्ट की टिप्पणी का मूल संदेश यह था कि किसी महिला की क्षमता का आकलन केवल उसके महिला होने के आधार पर नहीं किया जा सकता। यदि कोई उम्मीदवार नौकरी के निर्धारित मानकों और योग्यताओं को पूरा करती है, तो केवल लिंग के आधार पर उसे अवसर से वंचित करना उचित नहीं है।
इस मामले की कानूनी लड़ाई करीब चार दशक तक चली। महिला ने सबसे पहले ट्रायल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वर्ष 1990 में ट्रायल कोर्ट ने IOC को निर्देश दिया था कि महिला को प्रशासनिक पद, कैजुअल कर्मचारी या चपरासी के पद पर नियुक्ति दी जाए। इसके बाद प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। मामला आगे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर 2025 को प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए महिला के पक्ष में फैसला सुनाया।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 17 सितंबर 2026 को महिला को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली। करीब 38 साल पुराने इस मामले में अदालत के फैसले ने नौकरी में लैंगिक भेदभाव के सवाल को एक बार फिर सामने ला दिया है। यह मामला इस बात पर भी बहस को रेखांकित करता है कि किसी नौकरी के लिए उम्मीदवार की योग्यता और क्षमता का मूल्यांकन निर्धारित मानकों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल उसके महिला या पुरुष होने के आधार पर।Keywords: सुप्रीम कोर्ट, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, IOC, करनाल बॉटलिंग प्लांट, महिला नौकरी मामला, लैंगिक भेदभाव, 38 साल पुराना केस
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Source: Filmitics







