Smartphone Use Among Children: बच्चों और किशोरों के लिए स्मार्टफोन अब सिर्फ कॉल या सिर्फ मनोरंजन का डिवाइस नहीं रह गया है. पढ़ाई, वीडियो देखने, सोशल मीडिया, ऑन…
Smartphone Use Among Children: बच्चों और किशोरों के लिए स्मार्टफोन अब सिर्फ कॉल या सिर्फ मनोरंजन का डिवाइस नहीं रह गया है. पढ़ाई, वीडियो देखने, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और जानकारी हासिल करने के लिए मोबाइल का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. आजकल बच्चों के बीच स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 10-19 साल की उम्र के 91 फीसदी बच्चे स्मार्टफोन इस्तेमाल कर रहे हैं. वर्ष 2020 में यह आंकड़ा 49% था. यानी कुछ सालों में इस आयु वर्ग में स्मार्टफोन इस्तेमाल में 42 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी हुई. वहीं, 10-14 साल के बच्चों में भी इस्तेमाल 19 फीसदी से बढ़कर 73% तक पहुंच गया है
स्मार्टफोन की पहुंच अब किशोरों तक सीमित नहीं है. कम उम्र के बच्चे भी मोबाइल के जरिए डिजिटल कंटेंट और इंटरनेट की दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, आंकड़ों में 5-9 साल के बच्चों में स्मार्टफोन इस्तेमाल 9% से बढ़कर 46% तक पहुंचा है. इसका मतलब है कि बच्चों का डिजिटल एक्सपोजर पहले की तुलना में अब बहुत कम उम्र में शुरू हो रहा है. ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बच्चा कितने घंटे मोबाइल चला रहा है. इस पर अहम सवाल यह भी है कि बच्चे इंटरनेट पर क्या देख रहे हैं, किससे बातचीत कर रहे हैं और वे लोग ऑनलाइन अपनी सुरक्षा के लिए क्या सावधानी बरत रहे हैं
अगस्त 2026 में सरकार ने बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों से जुड़े कई जोखिमों को लेकर चिंता जाहिर की है. सोशल मीडिया में हानिकारक कंटेंट, साइबरबुलिंग, ऑनलाइन शोषण, ज्यादा स्क्रीन टाइम और डिजिटल निर्भरता जैसे खतरे शामिल हैं. सरकार ने कहा है कि बच्चों को डिजिटल तकनीक का फायदा मिले, लेकिन इसके साथ उनकी ऑनलाइन सिक्योरिटी के लिए भी उचित सुरक्षा उपाय करना जरूरी हैं
इसका एक बड़ा कारण यह है कि स्मार्टफोन बच्चों को सिर्फ मनोरंजन तक नहीं, बल्कि सोशल मीडिया, मैसेजिंग और अनजान लोगों से संपर्क की संभावनाओं को भी बढ़ा देता है. ऐसे माहौल में साइबरबुलिंग, ऑनलाइन ग्रूमिंग, प्राइवेसी का उल्लंघन और गलत कंटेंट तक पहुंच जैसे जोखिम महत्वपूर्ण हो जाते हैं. सरकार के साइबर सेफ्टी पोर्टल पर भी माता-पिता और अभिभावकों को बच्चों से ऑनलाइन जोखिम और उनकी डिजिटल एक्टिविटीज को लेकर बातचीत करने की सलाह दी गई है
बच्चों के लिए माता-पिता के सामने एक और बड़ा मुद्दा सामने आ रहा है कि डिजिटल एक्सेस और डिजिटल सेफ्टी एक जैसी चीज नहीं हैं. बच्चा स्मार्टफोन चला सकता है, वीडियो सर्च कर सकता है या सोशल मीडिया यूज कर सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि उसे अपना प्रोफाइल प्राइवेट करने, पासवर्ड बदलने, किसी अकाउंट को ब्लॉक करने या गलत कंटेंट की रिपोर्ट करने की जानकारी भी होनी चाहिए. यही कारण है कि बच्चों के लिए डिजिटल एजुकेशन में सिर्फ तकनीक का प्रयोग सिखाना काफी नहीं है. उन्हें यह भी समझाना भी जरूरी है कि पर्सनल फोटोज, लोकेशन, स्कूल की जानकारी, पासवर्ड या अन्य पर्सनल डिटेल ऑनलाइन शेयर नहीं करनी चाहिए
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए भारत में IT एक्ट, IT रूल्सऔर डिजीटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट जैसे कानूनी प्रावधान भी मौजूद हैं. DPDP Act के तहत, बच्चों के पर्सनल डेटा की सुरक्षा के लिए भी कुछ विशेष प्रावधान हैं. इसमें बच्चों के डेटा को प्रोसेस करने से पहले अभिभावक की वेरिफिकेशन योग्य सहमति और बच्चों की ट्रैकिंग, बिहेवियरल मॉनिटरिंग तथा टारगेटेड विज्ञापन जैसी गतिविधियों पर रोक के प्रावधान शामिल हैं
इकॉनमिक सर्वे 2025-26 ने भी डिजिटल एडिक्शन को बच्चों और युवाओं के लिए चुनौती माना है. इस सर्वे में ज्यादा डिजिटल यूज के संभावित असर के तौर पर पढ़ाई, एकाग्रता, नींद, सामाजिक जुड़ाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख किया गया है. इसमें साइबरबुलिंग और कमपल्सिव गेमिंग जैसे जोखिमों पर भी ध्यान दिया गया है
ऐसे में एक्सपर्ट्स और सरकारी पहल इस बात पर जोर दे रही हैं कि बच्चों को तकनीक से पूरी तरह दूर करने के बजाय सिक्योरिटी, संतुलित और जिम्मेदारी के साथ डिजिटल यूज भीसिखाया जाए. अभिभावकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है- बच्चे का फोन चेक करने से ज्यादा जरूरी है उसके साथ ऑनलाइन एक्सपीरियंस पर भी खुलकर बातचीत करना और उसे किसी परेशानी की स्थिति में तुरंत बताने के लिए सुरक्षित माहौल देना
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Source: NewsNation TV







