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अंतराष्ट्रीय

आजादी के अमृतकाल में गणतंत्र की स्थापना के 74 साल बाद तक कैदियों को जेल मैन्युअल के आधार पर जातीय दुराग्रह का शिकार बनाया जाता रहा ?

By admin · October 6, 2024 · 1 min read

आजादी के अमृतकाल में गणतंत्र की स्थापना के 74 साल बाद तक कैदियों को जेल मैन्युअल के आधार पर जातीय दुराग्रह का शिकार बनाया जाता रहा और किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लोकतंत्र को कलंकित करने वाले प्रावधानों के खिलाफ किसी पत्रकार को अदालत से आग्रह करना पड़े, इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है?

देश में जातीय भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है। समय-समय पर सामने आने वाली कुछ घटनाओं से जातिवाद की जड़ों की गहराई का थोड़ा-बहुत अहसास ही हो पाता है। पत्रकार सुकन्या शांता बनाम भारत सरकार व अन्य ऐसा ही एक उदाहरण है। एक जनहित याचिका पर ‘स्वत: संज्ञान’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विभिन्न राज्यों में अपनाए जा रहे जेल मैन्युअल के उन प्रावधानों को असंवैधानिक करार दिया, जिनके आधार पर कैदियों के साथ जातीय भेदभाव किया जाता रहा है। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर अपने जेल मैन्युअल संशोधित करने का निर्देश दिया है।

 

शीर्ष अदालत के इस फैसले पर किसी को हैरानी नहीं हुई होगी क्योंकि संविधान में तो स्पष्ट उल्लेख है कि धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। कोई ऐसा करता पाया जाता है तो उसके खिलाफ कानून भी हैं। हैरानी तो इस बात की है कि आजादी के अमृतकाल में गणतंत्र की स्थापना के 74 साल बाद तक कैदियों को जेल मैन्युअल के आधार पर जातीय दुराग्रह का शिकार बनाया जाता रहा और किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। लोकतंत्र को कलंकित करने वाले प्रावधानों के खिलाफ किसी पत्रकार को अदालत से आग्रह करना पड़े, इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है?
कैदियों की जाति देखकर उनके काम के निर्धारण को औपनिवेशिक काल के भी काफी पहले से चली आ रही कुप्रथाओं का नतीजा कहा जा सकता है। औपनिवेशिक काल में भी बदलाव इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि अंग्रेजों की नजर में हमारे मानवाधिकारों का कोई मूल्य नहीं था। वे तो ऐसे नियम बना रहे थे जिनसे भारतीयों को और बांटा जा सके। पर आजादी के बाद इतने सालों तक हम क्या कर रहे थे? क्या नागरिकों के रूप में यह हम सबकी विफलता नहीं है? ब्राह्मणों से खाने पकाने का काम और ‘हरि’ और ‘चांडाल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर कथित नीची जातियों से सीवर की सफाई व मैला ढुलवाने को आखिर नियम के रूप में कैसे स्वीकार किया जाता रहा?
जेल मैन्युअल ही नहीं, देश में गणतंत्र की स्थापना के साथ हर उस नियम को बदला जाना चाहिए था, जो संविधान की भावना के खिलाफ है। अब ‘देर आए पर दुरुस्त आए’ कहकर संतोष किया जा सकता है। हालांकि, शीर्ष अदालत को इस फैसले तक लाने का श्रेय पत्रकार सुकन्या शांता को ही दिया जाना चाहिए, जिसने नागरिक धर्म का भी बखूबी निर्वाह किया है। इसीलिए प्रधान न्यायाधीश डीवाइ चंद्रचूड़ ने भी अच्छे शोध वाली जनहित याचिका बताकर सुकन्या शांता की तारीफ की।

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