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सोनिया की आत्मकथा ‘Belonging’ से उठेंगे नेहरू-गांधी परिवार के अनकहे पहलुओं पर पर्दे –

September 1, 2026 · Ashish Bajpai · 1 मिनट पढ़ें

करीब तीन दशकों तक भारतीय राजनीति और कांग्रेस की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में शामिल रहीं सोनिया गांधी अब अपनी जिंदगी और नेहरू-गांधी परिवार की विरासत को अपनी आत्मकथा के जरिए सामने रखने जा रही हैं। उनकी आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ नवंबर में प्रकाशित होने वाली है। किताब को लेकर राजनीतिक गलियारों में पहले से ही काफी चर्चा है।

इटली में जन्मीं सोनिया गांधी 1965 में कैम्ब्रिज में पढ़ाई के दौरान राजीव गांधी से मिली थीं। इसके बाद उनका जीवन भारत और नेहरू-गांधी परिवार से जुड़ गया। किताब में उनके बचपन, राजीव गांधी से प्रेम, भारत आने और देश के सबसे चर्चित राजनीतिक परिवार का हिस्सा बनने तक के सफर को विस्तार से बताए जाने की उम्मीद है।

इंदिरा और राजीव गांधी की हत्या के दर्द का जिक्र

सोनिया गांधी के जीवन में कई बड़े व्यक्तिगत हादसे आए। 1984 में उनकी सास और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी। इसके सात साल बाद 1991 में आत्मघाती हमले में उनके पति और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की भी हत्या हो गई। ऐसे में उनकी आत्मकथा से इन घटनाओं के दौरान परिवार के भीतर की परिस्थितियों, उनके व्यक्तिगत दर्द और उन फैसलों के बारे में नई जानकारी सामने आने की उम्मीद है, जिन्होंने बाद में उनके राजनीतिक जीवन की दिशा तय की।

राजनीति में आने का फैसला क्यों किया?

राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से दूर रहीं। हालांकि, 1997 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली और एक साल के भीतर ही पार्टी की कमान संभाल ली।

उस समय उन्हें राजनीति में अनिच्छुक और अपेक्षाकृत बाहरी व्यक्ति के तौर पर देखा जाता था। लेकिन धीरे-धीरे सोनिया गांधी कांग्रेस की सबसे ताकतवर नेता बनकर उभरीं और पार्टी को कई महत्वपूर्ण राजनीतिक दौर से बाहर निकाला। उनकी किताब से इस सवाल का जवाब मिलने की उम्मीद है कि आखिर उन्होंने राजनीति में कदम रखने का फैसला क्यों किया और गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाना उनके लिए कितना महत्वपूर्ण था।

2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने का राज

सोनिया गांधी की राजनीतिक यात्रा का सबसे चर्चित फैसला 2004 का रहा, जब कांग्रेस के सत्ता में लौटने के बावजूद उन्होंने प्रधानमंत्री पद स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

पार्टी और सहयोगी दलों का समर्थन मिलने के बाद भी सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बजाय डॉ. मनमोहन सिंह को सरकार का नेतृत्व सौंप दिया। इस फैसले को लेकर वर्षों से कई सवाल उठते रहे हैं। उनकी आत्मकथा में यह स्पष्ट हो सकता है कि क्या विदेशी मूल को लेकर विवाद, परिवार की सुरक्षा की चिंता या कोई अन्य निजी कारण इस फैसले के पीछे था।

रिमोट कंट्रोल’ के आरोपों पर भी नजर

2004 से 2014 के बीच कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान सोनिया गांधी को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा। आलोचकों ने उन्हें सरकार का “रिमोट कंट्रोल” तक कहा, जबकि समर्थकों ने उन्हें गठबंधन सरकार को एकजुट रखने वाली सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बताया।

इस दौर में सूचना का अधिकार कानून और मनरेगा जैसे बड़े फैसले हुए, लेकिन दूसरे कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों और नीतिगत गतिरोध ने सरकार की छवि को नुकसान भी पहुंचाया। अब सवाल है कि क्या सोनिया गांधी अपनी किताब में मनमोहन सिंह सरकार और अपने राजनीतिक प्रभाव को लेकर उठे विवादों पर खुलकर बात करेंगी।

राहुल और प्रियंका की राजनीति पर भी हो सकती है चर्चा

सोनिया गांधी ने 2017 में कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी राहुल गांधी को सौंप दी। राहुल गांधी के राजनीतिक सफर और प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीति में अपेक्षाकृत देर से औपचारिक एंट्री को लेकर भी लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।

किताब में यह भी सामने आ सकता है कि सोनिया गांधी अपने बच्चों की राजनीतिक भूमिका और गांधी परिवार की अगली पीढ़ी को किस नजरिए से देखती हैं।

नेहरू-गांधी परिवार की विरासत पर होगा फोकस

बिलॉन्गिंग: अ जर्नी ऑफ लव’ को सिर्फ एक राजनीतिक आत्मकथा के तौर पर नहीं, बल्कि सोनिया गांधी के व्यक्तिगत जीवन, परिवार, प्रेम, त्रासदी और राजनीतिक विरासत के दस्तावेज के रूप में देखा जा रहा है।

किताब से यह समझने की कोशिश होगी कि इटली के एक छोटे शहर से भारत आने वाली सोनिया गांधी ने खुद को नेहरू-गांधी परिवार और भारतीय राजनीति से किस तरह जोड़ा। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर अब इस बात पर है कि सोनिया गांधी अपनी आत्मकथा में किन सवालों के जवाब देती हैं और भारतीय राजनीति के किन बड़े रहस्यों को अब भी अनकहा छोड़ देती हैं।

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Source: Filmitics

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