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September 9, 2026
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Banbhoolpura Railway Land Dispute: बनभूलपुरा में 3500 से ज्यादा मकान, मस्जिद-मदरसे और जमीन का विवाद; सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी नजर –

September 9, 2026 · Ashish Bajpai · 1 मिनट पढ़ें

Banbhoolpura Railway Land Dispute: उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब 78 एकड़ जमीन…

Banbhoolpura Railway Land Dispute: उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा में रेलवे की जमीन को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। करीब 78 एकड़ जमीन से जुड़े इस मामले में हजारों परिवारों के घर, मस्जिद और मदरसे भी चर्चा के केंद्र में हैं। इलाके में 3500 से ज्यादा मकान होने और बड़ी आबादी के प्रभावित होने की बात सामने आई है।मामले को लेकर प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी है। विवाद का केंद्र जमीन के मालिकाना हक, अतिक्रमण और वहां लंबे समय से रह रहे परिवारों के अधिकार से जुड़ा है।

पूरा विवाद करीब 30 हेक्टेयर यानी 78 एकड़ जमीन को लेकर है। रेलवे का दावा है कि यह जमीन उसकी है और लंबे समय से इस पर अतिक्रमण कर मकान बनाए गए हैं।मामला उस समय और गंभीर हो गया, जब उत्तराखंड हाईकोर्ट में गौला नदी में अवैध खनन से संबंधित जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान अतिक्रमण हटाने के निर्देशों का मामला सामने आया। इसके बाद रेलवे ने अपनी जमीन बताते हुए वहां रहने वाले लोगों को जगह खाली करने के नोटिस जारी किए।इन नोटिसों और जमीन के स्वामित्व के दावे को स्थानीय लोगों ने चुनौती दी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

रेलवे की ओर से जमीन पर अपने अधिकार के समर्थन में अलग-अलग दस्तावेजों का हवाला दिया गया है। इनमें 1959 का नोटिफिकेशन, 1971 का राजस्व रिकॉर्ड और 2017 की सर्वे रिपोर्ट प्रमुख हैं।

रेलवे का कहना है कि इन दस्तावेजों से विवादित जमीन पर उसका अधिकार स्पष्ट होता है।

वहीं स्थानीय लोगों का दावा है कि शुरुआत में विवाद सीमित क्षेत्र को लेकर था, लेकिन बाद में रेलवे ने करीब 78 एकड़ क्षेत्र पर अपना दावा किया। स्थानीय निवासियों के मुताबिक, कई परिवार इस इलाके में दशकों से रह रहे हैं और उनका कहना है कि जमीन रेलवे की नहीं बल्कि राज्य सरकार की नजूल भूमि है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जमीन नजूल भूमि है तो सरकार को वहां रहने वाले परिवारों की स्थिति पर विचार करना चाहिए। कुछ लोग जमीन को फ्रीहोल्ड करने और अपनी रिहाइश को कानूनी मान्यता देने की मांग भी करते रहे हैं।

हालांकि, जमीन के वास्तविक स्वामित्व और उस पर कब्जे के अधिकार का अंतिम निर्धारण अदालती आदेश और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर ही होगा।

नजूल जमीन आम तौर पर ऐसी सरकारी भूमि होती है, जिसका स्वामित्व सरकार के पास रहता है और जिसे निर्धारित नियमों के तहत विभिन्न उपयोगों के लिए लीज पर दिया जा सकता है।

ऐसी जमीन के इस्तेमाल और उस पर निर्माण को लेकर सरकारी नियम लागू होते हैं। इसलिए किसी क्षेत्र को नजूल भूमि बताना अपने आप में वहां बने प्रत्येक निर्माण को वैध नहीं बनाता; इसके लिए संबंधित रिकॉर्ड और कानूनी स्थिति देखना जरूरी होता है।

बनभूलपुरा विवाद का एक महत्वपूर्ण अध्याय 8 फरवरी 2024 की हिंसा भी है। उस समय अतिक्रमण और अवैध निर्माण हटाने पहुंची प्रशासन तथा नगर निगम की टीम के विरोध के बाद इलाके में पथराव, आगजनी और हिंसा की घटनाएं हुई थीं।

हिंसा के दौरान सरकारी और नगर निगम की संपत्तियों को नुकसान पहुंचने की बात सामने आई थी। इसके बाद इलाके में कर्फ्यू लगाया गया और बड़ी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की गई।

नगर निगम की ओर से मामले में मुख्य आरोपी बताए गए अब्दुल मलिक से नुकसान की भरपाई के लिए करीब 2.45 करोड़ रुपये की रिकवरी की कार्रवाई भी की गई थी।

2024 की हिंसा के बाद बनभूलपुरा में तनाव का असर स्थानीय लोगों की जिंदगी पर भी पड़ा। उस समय कई परिवारों के इलाके से बाहर जाने की रिपोर्ट सामने आई थी।

हालांकि, ऐसे मामलों में पलायन से जुड़े आंकड़ों और कारणों को अलग-अलग स्रोतों के आधार पर देखना जरूरी है।

बनभूलपुरा जमीन विवाद में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे अहम सवाल जमीन के स्वामित्व, वहां रह रहे परिवारों के अधिकार और संभावित विस्थापन से जुड़े रहे हैं।

आपके दिए विवरण के अनुसार, 24 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन को रेलवे की जमीन माना था। अदालत ने रेलवे के अधिकार क्षेत्र वाली जमीन के इस्तेमाल के अधिकार से जुड़े निर्देश भी दिए थे।

इसके साथ ही प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और तत्काल राहत के मुद्दे पर भी व्यवस्था की गई थी।

मामले में प्रभावित परिवारों की पहचान और पुनर्वास को लेकर भी निर्देश दिए गए। पात्र विस्थापित परिवारों को छह महीने तक हर महीने 2,000 रुपये की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान बताया गया है।

इसके अलावा स्थायी पुनर्वास के लिए जिला प्रशासन, राजस्व अधिकारियों और रेलवे को मिलकर काम करने के निर्देश दिए जाने की बात कही गई है।

बनभूलपुरा में पुनर्वास केंद्र बनाए जाने का मुद्दा भी इसी संदर्भ में सामने आया।

बनभूलपुरा विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जमीन के दावे के दायरे में बड़ी संख्या में घर होने की बात कही जा रही है। इलाके में 3500 से ज्यादा मकान और करीब 50 हजार लोगों की आबादी का उल्लेख किया गया है।

इसके अलावा यहां धार्मिक स्थलों और अन्य निर्माणों के होने से मामला केवल जमीन के स्वामित्व तक सीमित नहीं रह जाता। किसी भी कार्रवाई का असर बड़ी संख्या में परिवारों की रिहाइश और पुनर्वास पर पड़ सकता है।

बनभूलपुरा मामले में अब आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर सभी की नजर है। एक तरफ रेलवे अपनी जमीन पर मालिकाना हक और उसके इस्तेमाल का अधिकार बता रहा है, वहीं स्थानीय लोग जमीन की स्थिति और अपने लंबे समय से चले आ रहे निवास को आधार बनाकर राहत की मांग करते रहे हैं।

ऐसे में अदालत का फैसला इस विवाद की आगे की कानूनी दिशा और प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

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Source: Filmitics

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