उत्तर प्रदेश की सियासत में रामपुर सदर विधानसभा सीट का नाम आते ही लंबे समय तक सबसे पहले आजम खान की सियासी पकड़ की चर्चा होती रही। रामपुर को समाजवादी पार्टी का म…
उत्तर प्रदेश की सियासत में रामपुर सदर विधानसभा सीट का नाम आते ही लंबे समय तक सबसे पहले आजम खान की सियासी पकड़ की चर्चा होती रही। रामपुर को समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता था और यहां बीजेपी के लिए चुनावी चुनौती बेहद बड़ी मानी जाती थी। लेकिन 2022 के बाद इस सीट की राजनीतिक तस्वीर में ऐसा बदलाव आया, जिसने पूरे प्रदेश की सियासत का ध्यान रामपुर की तरफ खींच दिया।
रामपुर सदर सीट पर आजम खान का राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक देखने को मिला। 2017 में भी समाजवादी पार्टी ने यहां जीत दर्ज की। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में आजम खान जेल में रहते हुए चुनाव मैदान में उतरे और जीत हासिल की। यह नतीजा रामपुर में उनके प्रभाव का एक और बड़ा संकेत माना गया।हालांकि, कानूनी मामले में सजा के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो गई और रामपुर सदर सीट पर उपचुनाव की स्थिति बनी। दिसंबर 2022 में हुए उपचुनाव ने इस सीट का चुनावी इतिहास ही बदल दिया।
उपचुनाव में बीजेपी ने आकाश सक्सेना को मैदान में उतारा, जबकि समाजवादी पार्टी की ओर से आसिम रजा चुनाव लड़े। आकाश सक्सेना पहले से ही आजम खान और उनके परिवार से जुड़े कई कानूनी मामलों को लेकर सक्रिय रहे थे। उनके पिता शिव बहादुर सक्सेना भी बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री रह चुके हैं।
चुनाव नतीजे आए तो बीजेपी ने रामपुर सदर सीट पर पहली बार जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया। आकाश सक्सेना ने सपा के आसिम रजा को करीब 33 हजार 700 वोटों के अंतर से हराया। यह जीत सिर्फ एक उपचुनाव की जीत नहीं मानी गई, बल्कि रामपुर की लंबे समय से चली आ रही सियासी तस्वीर में बदलाव के संकेत के तौर पर भी देखी गई।
अब नजर 2027 के विधानसभा चुनाव पर है। रामपुर में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी संख्या चुनावी समीकरण को बेहद महत्वपूर्ण बनाती है। इसके साथ वैश्य, लोधी राजपूत, दलित और अन्य सामाजिक समूहों का समर्थन भी चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकता है।
बीजेपी के सामने चुनौती होगी कि वह 2022 के उपचुनाव में मिली बढ़त को विधानसभा चुनाव में भी बरकरार रख सके। पार्टी विकास, कानून-व्यवस्था और संगठन के आधार पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर सकती है।
वहीं समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल रामपुर में अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव को फिर से मजबूत करने का होगा। सपा अपने परंपरागत समर्थन और आजम खान की राजनीतिक विरासत को चुनावी मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल कर सकती है। हालांकि, 2027 का नतीजा कई स्थानीय समीकरणों, उम्मीदवारों, गठबंधन और चुनावी मुद्दों पर निर्भर करेगा।
रामपुर की लड़ाई इसलिए भी दिलचस्प होगी क्योंकि 2022 में यहां जो राजनीतिक बदलाव दिखाई दिया, उसकी दिशा 2027 में और साफ हो सकती है। क्या समाजवादी पार्टी रामपुर को फिर अपने पुराने प्रभाव में ला पाएगी? क्या बीजेपी अपनी ऐतिहासिक जीत को दोहरा सकेगी? या फिर कोई नया सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बाजी पलट देगा?
2027 में रामपुर सदर सीट का मुकाबला सिर्फ एक विधानसभा सीट की लड़ाई नहीं होगा। यह चुनाव काफी हद तक तय कर सकता है कि रामपुर में आजम खान के दौर की सियासत वापस लौटती है या बीजेपी का नया राजनीतिक अध्याय और मजबूत होता है।
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Source: Filmitics







