नई दिल्ली: 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट खोलने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर गुरुवार, 10 सितंबर को सुनवाई हुई। याचिका में नाबाल…
नई दिल्ली: 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट खोलने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका पर गुरुवार, 10 सितंबर को सुनवाई हुई। याचिका में नाबालिगों द्वारा सोशल मीडिया अकाउंट बनाने के लिए किए गए कॉन्ट्रैक्ट को अमान्य घोषित करने की मांग की गई है। साथ ही अकाउंट बनाने से पहले माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति और ई-KYC अनिवार्य करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील एच.एस. फुल्का ने कोर्ट के सामने दलीलें रखीं। दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने मामले को अहम मानते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन एलायंस’ (JRCA) की ओर से दाखिल याचिका में भारतीय कानूनों का हवाला दिया गया है। याचिका के मुताबिक मेजोरिटी एक्ट, 1875 के तहत भारत में वयस्क होने की उम्र 18 साल है। वहीं, इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 के तहत नाबालिग किसी कानूनी कॉन्ट्रैक्ट के लिए सक्षम नहीं है। याचिका में 2023 के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट का भी उल्लेख किया गया है। इसमें बच्चों का सोशल मीडिया अकाउंट बनाने के लिए माता-पिता की सहमति को जरूरी बताया गया है।
13 साल की उम्र में अकाउंट की सुविधा पर सवाल
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि भारतीय कानूनों के बावजूद कई डिजिटल प्लेटफॉर्म अमेरिकी कानून के आधार पर 13 साल की उम्र से स्वतंत्र सोशल मीडिया अकाउंट बनाने की अनुमति देते हैं। इनमें मेटा, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म शामिल हैं। याचिका में कहा गया है कि बच्चों की उम्र की उचित जांच और अभिभावकों की निगरानी के बिना सोशल मीडिया का इस्तेमाल उनकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
ऑनलाइन ग्रूमिंग और साइबर बुलिंग का खतरा
याचिकाकर्ता संस्था ने बच्चों के ऑनलाइन ग्रूमिंग, मानव तस्करी, साइबर बुलिंग और यौन शोषण जैसे खतरों का मुद्दा उठाया है। याचिका में मांग की गई है कि सोशल मीडिया कंपनियां केवल जन्मतिथि पूछने के बजाय तकनीकी माध्यमों से भी यूजर की उम्र की पुष्टि करें। इसके साथ ही बच्चों के लिए अभिभावकों की निगरानी वाली सुरक्षित डिजिटल व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।
बच्चों की तस्वीरों और निजी जानकारी के दुरुपयोग की चिंता
सुनवाई के दौरान बच्चों की तस्वीरों और निजी जानकारी के गलत इस्तेमाल का मुद्दा भी उठाया गया। याचिका में एक मामले का जिक्र करते हुए बताया गया कि पॉप स्टार बनाने का झांसा देकर दो नाबालिग लड़कियों को दक्षिण कोरिया भेजने के नाम पर घर से भगाया गया था। बाद में दोनों को सिलीगुड़ी में बचाया गया। याचिका में सोशल मीडिया के बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसमें ज्यादा स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया की लत, डिप्रेशन, एकाग्रता में कमी और बच्चों को प्रभावित करने वाले एल्गोरिदम को नुकसानदेह बताया गया है।
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Source: Filmitics







