आरक्षण पर राकेश टिकैत का बयान, आर्थिक आधार की मांग से छिड़ी नई बहस; ठाकुर-ब्राह्मणों की स्थिति का किया जिक्र
देश में आरक्षण को लेकर चल रही बहस के बीच किसान नेता राकेश टिकैत के एक बयान ने चर्चा को नया मोड़ दे दिया है। टिकैत ने जातिगत आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत करते हुए कहा कि गरीब व्यक्ति किसी भी जाति का हो, उसे शिक्षा, रोजगार और अन्य अवसरों में मदद मिलनी चाहिए। उन्होंने सामान्य वर्ग के गरीब परिवारों, खासकर ब्राह्मण और ठाकुर समाज की आर्थिक स्थिति का भी जिक्र किया।
राकेश टिकैत का कहना है कि सरकारी योजनाओं और अवसरों का लाभ देने में केवल जाति को आधार नहीं बनाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार किसी भी सामाजिक वर्ग से हो सकते हैं और ऐसे परिवारों के बच्चों को आगे बढ़ने के समान अवसर मिलने चाहिए।
टिकैत के इस बयान के बाद आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था और आर्थिक आधार पर सहायता को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।
इस बहस के बीच बिहार सरकार की 2023 की जाति आधारित गणना के आर्थिक आंकड़ों का भी जिक्र हो रहा है। इन आंकड़ों में सामान्य वर्ग के भीतर विभिन्न जातियों की आर्थिक स्थिति को लेकर आंकड़े सामने आए थे। रिपोर्ट के मुताबिक राजपूत समाज के करीब 24.89 प्रतिशत परिवार आर्थिक रूप से गरीब बताए गए थे।
इन आंकड़ों को आधार बनाकर यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सहायता और अवसर तय करते समय केवल उनकी जाति को आधार बनाया जाना चाहिए।
हालांकि, आरक्षण की बहस में यह समझना जरूरी है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का संवैधानिक आधार केवल आर्थिक स्थिति नहीं है। SC/ST आरक्षण ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव, वंचना और प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों से संबंधित है।
वहीं, सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए EWS आरक्षण की व्यवस्था पहले से लागू है। इसके तहत आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग के पात्र लोगों को आरक्षण का लाभ दिया जाता है।
आर्थिक आधार पर आरक्षण या मौजूदा आरक्षण व्यवस्था में बदलाव को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता समय-समय पर अपनी राय रखते रहे हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओमप्रकाश राजभर, निषाद पार्टी के संजय निषाद और हम के जीतन राम मांझी भी अलग-अलग मौकों पर आरक्षण को आर्थिक आधार से जोड़ने की बात कह चुके हैं।
हालांकि, आरक्षण व्यवस्था में बदलाव का मुद्दा राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर बेहद संवेदनशील विषय रहा है।
राकेश टिकैत के बयान के बाद चर्चा का एक अहम पहलू यह भी है कि सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के मुद्दों को राजनीतिक स्तर पर कितनी मजबूती से उठाया जाता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि सत्ता और राजनीति में प्रभावशाली सवर्ण नेताओं को अपने समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की समस्याओं को लेकर क्या अधिक मुखर होना चाहिए।
कुल मिलाकर, राकेश टिकैत के बयान ने आरक्षण की बहस को केवल जातिगत प्रतिनिधित्व तक सीमित रखने के बजाय आर्थिक स्थिति, अवसर और सामाजिक न्याय के नजरिए से देखने की चर्चा को फिर सामने ला दिया है। अब बहस इस सवाल पर केंद्रित होती दिख रही है कि आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति की मदद का आधार उसकी जाति होनी चाहिए या उसकी वास्तविक आर्थिक स्थिति।
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Source: Filmitics







