क्या OBC आरक्षण का आधार बदलने वाला है? एक तरफ मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से ओबीसी ‘क्रीमी लेयर’ के नए नियम को टालने के लिए 2 साल का समय मांगा है, तो दूसरी तरफ…
क्या OBC आरक्षण का आधार बदलने वाला है? एक तरफ मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से ओबीसी ‘क्रीमी लेयर’ के नए नियम को टालने के लिए 2 साल का समय मांगा है, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है कि क्या ओबीसी आरक्षण भी अब सवर्णों के EWS की तरह पूरी तरह ‘आर्थिक’ होने जा रहा है? पूरा मामला इसी साल मार्च में आए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से शुरू होता है। कोर्ट ने कहा कि किसी ओबीसी उम्मीदवार को ‘क्रीमी लेयर’ यानी आरक्षण के दायरे से बाहर करने के लिए सिर्फ उसके माता-पिता की ‘सैलरी’ या तनख्वाह को आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए 1993 के मूल नियमों के तहत पद के दर्जे (Status) को देखना होगा। अब मोदी सरकार का कहना है कि अगर इस नियम को पिछली तारीख से लागू किया गया, तो पिछले कई सालों की सरकारी भर्तियों और नौकरियों की सीनियरिटी में भारी प्रशासनिक अराजकता फैल जाएगी। इसीलिए सरकार ने कोर्ट से नीति बनाने के लिए 2 साल का समय मांगा है।
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इस विवाद के बीच कई लोग पूछ रहे हैं कि क्या अब ओबीसी में भी सवर्णों की तरह केवल आर्थिक आधार पर आरक्षण होगा? इसका जवाब है—बिल्कुल नहीं। दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है, पहला अंतर (बुनियादी आधार) सवर्णों को मिलने वाला EWS आरक्षण पूरी तरह से ‘आर्थिक आधार’ (Poverty Test) पर टिका है। इसमें आपकी जाति मायने नहीं रखती, सिर्फ गरीबी और सालाना 8 लाख रुपये से कम की पारिवारिक आय मायने रखती है। इसके विपरीत, OBC आरक्षण का मूल आधार ‘सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन’ है, न कि आर्थिक तंगी। दूसरा अंतर (आय की गणना): EWS में आपके माता-पिता की सैलरी, खेती की जमीन, व्यापार सब कुछ मिलाकर 8 लाख की लिमिट तय होती है। लेकिन ओबीसी ‘क्रीमी लेयर’ में 1993 के नियमों के मुताबिक, माता-पिता की सैलरी और खेती से होने वाली कमाई को इस 8 लाख रुपये की सीमा में नहीं जोड़ा जाता। वहां केवल पद का स्टेटस (जैसे क्लास-1 या क्लास-2 ऑफिसर) देखा जाता है।तो सरल शब्दों में समझें, तो सुप्रीम कोर्ट का यह नया फैसला ओबीसी समाज के लिए एक राहत की खबर है। इससे उन ओबीसी युवाओं को आरक्षण का लाभ मिल सकेगा जिनके माता-पिता किसी बैंक, पीएसयू या प्राइवेट नौकरी में हैं और उनकी सैलरी तो 8 लाख से ज्यादा है, लेकिन वे बड़े अधिकारी (Class-1) नहीं हैं। यानी, सवर्णों का EWS आरक्षण जहाँ विशुद्ध रूप से ‘आर्थिक’ है, वहीं ओबीसी आरक्षण अपनी मूल भावना यानी ‘सामाजिक प्रतिनिधित्व’ और जातिगत पिछड़ेपन पर ही आधारित रहेगा, उसमें कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है।
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Source: Filmitics







