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October 16, 2026
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यमुनोत्री में पार्टी नहीं, प्रत्याशी का चलता है सिक्का! 2027 में फिर पलटेगा चुनावी खेल? –

October 16, 2026 · Ashish Bajpai · 1 मिनट पढ़ें

उत्तराखंड की यमुनोत्री सीट… यहां न कमल की गारंटी चलती है, न पंजे का भरोसा! जनता का मूड बदला, तो सत्ता की लहर भी बेअसर हो गई। 2012 में क्षेत्रीय दल की जीत, 2017…

उत्तराखंड की यमुनोत्री सीट… यहां न कमल की गारंटी चलती है, न पंजे का भरोसा! जनता का मूड बदला, तो सत्ता की लहर भी बेअसर हो गई। 2012 में क्षेत्रीय दल की जीत, 2017 में BJP का कब्जा और 2022 में निर्दलीय संजय डोभाल का ऐसा धमाका कि BJP-कांग्रेस दोनों देखते रह गए! अब 2027 में सवाल है क्या संजय डोभाल अपनी कुर्सी बचा पाएंगे, या यमुनोत्री एक बार फिर किसी नए सियासी खिलाड़ी को मौका देगी? जी हां, उत्तरकाशी जिले की यमुनोत्री विधानसभा सीट नंबर 1 नहीं, बल्कि उत्तराखंड की उन सीटों में शामिल है जहां चुनावी समीकरण हर बार नई कहानी लिखते नजर आए हैं। यहां पार्टी का झंडा महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़ और जनता के बीच उसकी छवि भी बड़ा फैक्टर बनती है। पहले चुनावी इतिहास का हिसाब देखिए!

2012 में प्रीतम सिंह पंवार ने UKD के टिकट पर जीत दर्ज की। 2017 में BJP के केदार सिंह रावत ने बाजी मार ली। लेकिन 2022 में फिर चुनावी तस्वीर पलट गई। निर्दलीय संजय डोभाल ने कांग्रेस के दीपक को हराकर विधानसभा में एंट्री की, जबकि BJP के केदार सिंह रावत तीसरे स्थान पर खिसक गए।यानी जिस सीट पर BJP और कांग्रेस जैसे बड़े दल अपनी ताकत के भरोसे मदान में उतरते हैं, वहां जनता ने निर्दलीय उम्मीदवार को मौका देकर साफ संदेश दिया कि यमुनोत्री में सिर्फ पार्टी के नाम पर चुनाव नहीं जीता जा सकता!लेकिन अब 2027 की लड़ाई में संजय डोभाल के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी अपनी जीत को दोहराने की। निर्दलीय विधायक के तौर पर जनता का भरोसा जीतना एक बात है, लेकिन पांच साल के कामकाज के आधार पर दोबारा समर्थन हासिल करना बिल्कुल अलग परीक्षा है।दूसरी तरफ BJP और कांग्रेस के पास अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का मौका होगा। दोनों दलों को मजबूत उम्मीदवार उतारने के साथ-साथ स्थानीय असंतोष, संगठन और बागियों के संभावित असर का भी हिसाब लगाना होगा।और यमुनोत्री का सबसे बड़ा चुनावी पेंच है गंगा घाटी बनाम यमुना घाटी का संतुलन! किस इलाके को कितना विकास मिला, सड़कें कितनी सुधरीं, स्वास्थ्य सुविधाएं कितनी बेहतर हुईं और युवाओं को रोजगार के कितने अवसर मिले ये सवाल चुनावी नतीजों पर असर डाल सकते हैं।

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Source: Filmitics

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