कैराना: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में कैराना विधानसभा सीट हमेशा से चर्चा के केंद्र में रही है। कभी पलायन का मुद्दा यहां की सियासत को गरमाता रहा तो कभी गन…
कैराना: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में कैराना विधानसभा सीट हमेशा से चर्चा के केंद्र में रही है। कभी पलायन का मुद्दा यहां की सियासत को गरमाता रहा तो कभी गन्ना किसानों के बकाए और किसान हितों से जुड़े सवाल चुनावी मुद्दे बने। अब 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर एक बार फिर कैराना में राजनीतिक हलचल तेज होने लगी है। सवाल बड़ा है—क्या समाजवादी पार्टी अपना मजबूत आधार बचा पाएगी या भारतीय जनता पार्टी इस बार समीकरण बदलकर बड़ा उलटफेर करेगी?
कैराना विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की विधानसभा सीट संख्या 8 है और यह कैराना लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के नाहिद हसन ने बीजेपी की मृगांका सिंह को 25,887 वोटों के अंतर से हराया था। इस चुनाव में सपा को करीब 54 फीसदी वोट मिले, जबकि बीजेपी लगभग 43 फीसदी वोट के साथ दूसरे स्थान पर रही। आंकड़े बताते हैं कि सपा ने जीत जरूर हासिल की, लेकिन बीजेपी भी यहां मजबूत चुनौती पेश करने में सफल रही।
2024 के लोकसभा चुनाव में कैराना विधानसभा क्षेत्र के आंकड़ों पर नजर डालें तो समाजवादी पार्टी को 1,16,265 वोट मिले, जबकि बीजेपी के खाते में 85,616 वोट आए। इस तरह सपा ने बीजेपी पर करीब 30,649 वोटों की बढ़त बनाई। हालांकि 2022 के मुकाबले दोनों प्रमुख दलों के वोट में कमी देखने को मिली। यही वजह है कि 2027 में सिर्फ पिछले चुनाव के आंकड़ों के आधार पर तस्वीर तय करना आसान नहीं होगा।
अब चुनावी चर्चा का सबसे अहम हिस्सा जातीय समीकरण है। कैराना में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 1.34 लाख बताई जाती है। इसके अलावा कश्यप, गुर्जर, जाट और सैनी समाज भी चुनावी नतीजों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उपलब्ध राजनीतिक आकलनों के मुताबिक कश्यप मतदाता करीब 35 हजार, गुर्जर करीब 30 हजार, जाट लगभग 19 हजार और सैनी मतदाता करीब 16 हजार बताए जाते हैं।
कैराना में सिर्फ मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण ही चुनाव की दिशा तय करेगा, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी। कश्यप, गुर्जर, जाट, सैनी के साथ एससी, ब्राह्मण, वैश्य और अति पिछड़े वर्ग के मतदाता भी चुनावी समीकरण में महत्वपूर्ण हैं। यही वजह है कि 2027 में दोनों प्रमुख दल सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने की कोशिश करेंगे।
समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने परंपरागत समर्थन आधार को बनाए रखने के साथ दूसरे सामाजिक समूहों में भी पकड़ मजबूत करने की होगी। वहीं बीजेपी 2022 और 2024 में मिली हार को पीछे छोड़कर कैराना में वापसी की रणनीति पर काम कर सकती है।
कैराना की लड़ाई इसलिए भी अहम है क्योंकि इसका असर सिर्फ एक विधानसभा सीट तक सीमित नहीं माना जाता। पश्चिमी यूपी में जातीय और सामाजिक समीकरणों की दिशा बदलने की क्षमता रखने वाली इस सीट पर 2027 में मुकाबला बेहद दिलचस्प हो सकता है।अब असली सवाल यही है क्या नाहिद हसन और समाजवादी पार्टी कैराना का किला फिर बचा पाएंगे, या बीजेपी बूथ स्तर की रणनीति और सामाजिक समीकरणों के दम पर इस बार बाजी पलट देगी?
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Source: Filmitics

