लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ विधानसभा सीटें सिर्फ चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि किसी पार्टी की राजनीतिक पहचान का हिस्सा बन जाती हैं। करहल व…
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ विधानसभा सीटें सिर्फ चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि किसी पार्टी की राजनीतिक पहचान का हिस्सा बन जाती हैं। करहल विधानसभा सीट भी ऐसी ही सीट है। सैफई से नजदीकी और समाजवादी पार्टी के यादव परिवार से गहरे राजनीतिक जुड़ाव के कारण करहल को लंबे समय से सपा के मजबूत गढ़ के तौर पर देखा जाता है। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी इस किले को चुनौती देने के लिए सामाजिक समीकरणों पर बड़ा दांव लगाने की तैयारी में नजर आ सकती है।सबसे पहले 2022 के चुनावी नतीजे पर नजर डालें। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद करहल से मैदान में उतरे थे। उन्होंने बीजेपी के एसपी सिंह बघेल को बड़े अंतर से हराया था। अखिलेश यादव को 1,48,196 वोट मिले, जबकि एसपी सिंह बघेल के खाते में 80,692 वोट आए। इस तरह जीत का अंतर करीब 67,504 वोट रहा।
यह नतीजा करहल में सपा की मजबूत पकड़ का बड़ा संकेत माना गया। लेकिन इसके बाद 2024 के उपचुनाव ने इस सीट की राजनीतिक तस्वीर में एक महत्वपूर्ण बदलाव जरूर दिखाया।
अखिलेश यादव के लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचने के बाद करहल विधानसभा सीट खाली हुई। उपचुनाव में सपा ने तेज प्रताप यादव को मैदान में उतारा, जबकि बीजेपी ने अनुजेश प्रताप सिंह को उम्मीदवार बनाया। सपा ने सीट पर जीत कायम रखी, लेकिन जीत का अंतर 2022 के मुकाबले काफी कम हो गया।
यही बदलाव अब 2027 के चुनाव को लेकर राजनीतिक विश्लेषण का अहम आधार बन गया है। सपा के सामने चुनौती है कि वह करहल में अपनी पुरानी बढ़त को फिर से मजबूत करे, जबकि बीजेपी की कोशिश होगी कि पिछले चुनावों में मिले समर्थन को व्यापक सामाजिक गठजोड़ में बदला जाए।
करहल में सपा के लिए सबसे बड़ा आधार यादव मतदाता माने जाते हैं। सैफई और मैनपुरी क्षेत्र से जुड़ा राजनीतिक प्रभाव भी पार्टी के पक्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। इसके साथ ही मुस्लिम मतदाताओं का रुख भी मुकाबले में अहम हो सकता है।लेकिन बीजेपी की नजर सपा के पारंपरिक आधार से बाहर मौजूद मतदाताओं पर होगी। शाक्य, लोधी, मौर्य-कुशवाहा, सवर्ण और गैर-जाटव दलित मतदाताओं का संभावित सामाजिक समीकरण चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है। हालांकि किसी भी जातीय समूह के वोट को पूरी तरह एकतरफा मानना सही नहीं होगा।
2027 में बीजेपी की रणनीति में उम्मीदवार का चयन बेहद महत्वपूर्ण होगा। पार्टी ऐसा चेहरा तलाश सकती है जो सपा के मजबूत यादव आधार के बाहर दूसरे सामाजिक समूहों को जोड़ने में सक्षम हो।वहीं सपा के लिए चुनौती सिर्फ करहल जीतना नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक बढ़त को फिर से बड़े अंतर में बदलना होगी। 2024 में घटा जीत का अंतर बीजेपी के लिए उम्मीद का संकेत है, जबकि सपा के लिए यह सतर्क होने की वजह।
करहल का मुकाबला सीधे तौर पर सपा और बीजेपी के बीच दिखाई दे सकता है, लेकिन बसपा समेत अन्य दलों का प्रदर्शन भी वोटों के बंटवारे को प्रभावित कर सकता है। खासकर अगर किसी तीसरे दल को किसी सामाजिक वर्ग में अपेक्षाकृत अच्छा समर्थन मिलता है, तो उसका सीधा असर दोनों प्रमुख दलों के जीत-हार के अंतर पर पड़ सकता है।ऐसे में 2027 की करहल लड़ाई सिर्फ एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं होगी। यह मुकाबला सैफई के राजनीतिक प्रभाव बनाम बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग का भी परीक्षण होगा।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी करहल में अपना पुराना दबदबा कायम रख पाएंगे, या बीजेपी सामाजिक समीकरणों के सहारे इस मजबूत सियासी किले में सेंध लगाने में सफल होगी? जवाब 2027 के चुनावी मैदान में मिलेगा, लेकिन करहल की जंग अभी से यूपी की सबसे दिलचस्प चुनावी लड़ाइयों में शामिल होती दिख रही है।
रश्मि सिंह एक अनुभवी पत्रकार और डिजिटल कंटेंट राइटर हैं, जिन्हें हिंदी पत्रकारिता, न्यूज़ रिपोर्टिंग और डिजिटल मीडिया का व्यापक अनुभव है। उन्होंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है और अपने पत्रकारिता करियर में कई बड़े मीडिया संस्थानों और न्यूज़ चैनलों के साथ काम किया है।राजनीति, जनसरोकार, उत्तर प्रदेश की सियासत और समसामयिक मुद्दों पर उनकी विशेष पकड़ है। खबरों को सरल, तथ्यपरक और पाठकों के लिए रोचक अंदाज में प्रस्तुत करना उनकी लेखन शैली की खासियत है। डिजिटल पत्रकारिता के बदलते दौर में रश्मि सिंह का प्रयास है कि पाठकों तक तेज, विश्वसनीय और आसान भाषा में तथ्य आधारित खबरें पहुंचें।
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Source: Filmitics







