ECI Form 6:नए मतदाताओं के लिए भरे जाने वाले फॉर्म-6 को लेकर चुनाव आयोग एक बड़े विवाद में फंसता दिख रहा है. दरअसल, आयोग का दावा है कि इस फॉर्म के साथ जोड़े गए न…
ECI Form 6:नए मतदाताओं के लिए भरे जाने वाले फॉर्म-6 को लेकर चुनाव आयोग एक बड़े विवाद में फंसता दिख रहा है. दरअसल, आयोग का दावा है कि इस फॉर्म के साथ जोड़े गए नए घोषणा-पत्र को सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही हरी झंडी दे दी है. लेकिन कानून के जानकारों का कहना है कि अदालत ने असल में क्या परखा था और आयोग अब क्या लागू कर रहा है, इन दोनों में बड़ा फर्क है
जानकारी के मुताबिक मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया वह बिहार में हुए SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आया था. इस फैसले में अदालत ने चुनाव आयोग के मतदाता सूची का SIR कराने के अधिकार को बरकरार रखा था. साथ ही कोर्ट ने यह भी माना था कि SIR के दौरान आयोग को दस्तावेजों का ढांचा तय करने के लिए कुछ शक्तियां हासिल है. लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अदालत ने जिस घोषणा-पत्र को परखा था, वह बिहार SIR के जून 2025 वाले आदेश के साथ जुड़ा घोषणा-पत्र था. आयोग अब जो नया घोषणा-पत्र दूसरे राज्यों में लागू कर रहा है वह उससे अलग है जिसकी सुप्रीम कोर्ट ने कभी अलग से जांचा ही नहीं की
एक रिपोर्ट के अनुसार आयोग ने एक बयान जारी कर कहा है कि SIR के दौरान फॉर्म-6 के साथ लगा घोषणा-पत्र सुप्रीम कोर्ट से मंजूर हो चुका है. साथ ही यह भी बताया है कि जब SIR चल नहीं रहा होगा तब निर्वाचक पंजीकरण नियम 1960 के तहत तय पुराने फॉर्म ही लागू रहेंगे
Is ECI Correct In Saying Supreme Court Upheld Its New Form 6 Declaration? |@DebbyJain Did the Supreme Court’s May 2026 judgment in #BiharSIR case examine the present Form 6 Declaration?#SupremeCourt #ElectionCommission #ECI
बिहार के आदेश वाले घोषणा-पत्र में आवेदक को अपनी उम्र, सामान्य निवास और नागरिकता की घोषणा करनी होती थी. जबकि जुलाई में जो बदलाव सामने आया, उसमें आवेदक से यह भी पूछा जा रहा है कि क्या वह या उसके माता-पिता या रिश्तेदार पिछले SIR में मतदाता के तौर पर दर्ज थे. यानी सवाल बदल गए हैं और वह बदला हुआ रूप अदालत के सामने कभी आया ही नहीं
अदालत ने साफ कहा था कि आयोग की यह शक्ति असीमित नहीं है. कोर्ट के मुताबिक SIR का ढांचा तय करते समय आयोग को मौजूदा कानूनी व्यवस्था को ध्यान में रखना होगा और कानून से किसी भी हटकर उठाए गए कदम का उस उद्देश्य से तर्कसंगत संबंध होना जरूरी है
बता दें नए घोषणा-पत्र में आवेदक का नाम, मोबाइल नंबर, पता और नागरिकता जैसी बुनियादी जानकारी के अलावा पिछले SIR से जुड़ी जानकारी भी मांगी जा रही है. आवेदक की अपनी जानकारी तभी देनी है जब वह लागू हो, लेकिन किसी रिश्तेदार की पिछले SIR वाली जानकारी देना वैकल्पिक नहीं लगता. इसमें रिश्तेदार का नाम, ईपीआईसी नंबर (अगर हो), रिश्ता, जिला, राज्य, विधानसभा क्षेत्र का नाम और नंबर, भाग संख्या और क्रम संख्या जैसे ब्योरे शामिल हैं
आयोग के दिशानिर्देशों के मुताबिक घोषणा वाले हिस्से में दी गई कोई भी गलत जानकारी जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 31 के तहत दंडनीय अपराध है. इसमें एक साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं
नए नियम के मुताबिक बूथ लेवल अधिकारी को घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर कर यह भरोसा देना है कि उसने दिए गए ब्योरे को पिछले SIR की मतदाता सूची से मिलाकर देखा है. इतना ही नहीं जिन आवेदकों की जानकारी पिछले SIR डेटाबेस से मेल नहीं खाएगी या मिलेगी ही नहीं उन्हें निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी नोटिस भेजेंगे
पिछले दिनों समाचार पत्र इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं. ये आपत्तियां मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता सूची के डेटा के केंद्रीकरण और SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसलों को लेकर थीं. रिपोर्ट के मुताबिक इन आयुक्तों ने फॉर्म-6 में हुए बदलाव को बिना नियम बदले किया गया ‘अनधिकृत और अवैध’ कदम बताया था
A press note from the Election Commission of India (@ECISVEEP) reads:The meeting of the Commission was held today i.e. 26.09.2026 at 3:00 PM. The following decisions were taken in the meeting:i. In case of any person to whom notice has been issued during the ongoing SIR, for… pic.twitter.com/4Axd8wEOVM
चुनाव आयोग ने इन खबरों को खारिज करते हुए कहा कि तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था में लिखित टिप्पणियां और तकनीकी सुझाव सामान्य कामकाज का हिस्सा हैं. आयोग का दावा है कि SIR समेत सभी फैसलों को पूरे आयोग की मंजूरी थी और वे सर्वसम्मति से लिए गए थे
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अधिवक्ता देवेंद्र कुमार डेढ़ा के मुताबिक अब आयोग को अदालत की कसौटी पर दो बातें साबित करनी पड़ सकती हैं. पहली कि किसी आवेदक को उसके रिश्तेदार के पिछले SIR वाले रिकॉर्ड से जोड़ने का उद्देश्य से तर्कसंगत संबंध क्या है. दूसरी कि जुलाई में यह नया नियम लाने का समय ही क्यों चुना गया. जबकि 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मतदाता पहले ही बिना इस मुश्किल शर्त के SIR प्रक्रिया से गुजर चुके थे. अधिवक्ता के मुताबिक यह मामला भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के सामने आ सकता है जहां असल फैसला होगा
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Source: NewsNation TV







