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अंतराष्ट्रीय

राजभवन हरियाणा का मेगा-घोटाला: बेरोज़गार युवाओं के भविष्य पर ‘रिटायर्ड वीआईपी’ की मौज

By admin · September 3, 2025 · 1 min read

 

चंडीगढ़।
हरियाणा में युवाओं की बेरोज़गारी पहले ही गहरी चिंता का विषय है, लेकिन अब राजभवन से निकली खबर ने इस समस्या पर और चोट कर दी है। यहाँ एक रिटायर्ड अधिकारी जगन्नाथ बैंस, जिनकी सेवा 2019 में समाप्त हो चुकी थी, आज 2025 तक भी पूरी तनख्वाह और वीआईपी सुविधाओं के साथ पद पर बने हुए हैं। न सिर्फ़ बने हुए हैं, बल्कि उन्हें अतिरिक्त चार्ज भी दिया जा चुका है।

अनुबंध नियुक्ति की कहानी

श्री जगन्नाथ बैंस, निवासी मकान नंबर 699, सेक्टर-7, चंडीगढ़, को राजभवन हरियाणा में Comptroller Governor’s Household एवं Director Hospitality के पद पर नियुक्त किया गया था। यह नियुक्ति 06.04.2015 की आउटसोर्सिंग पॉलिसी के पैरा (vii) के तहत 01.07.2019 से 30.06.2020 तक, एक वर्ष के लिए अनुबंध आधार पर की गई थी या जब तक नियमित नियुक्ति न हो जाए। लेकिन, तय अवधि बीतने के बाद भी बैंस को लगातार सेवा विस्तार मिलता गया और वह आज तक पद पर बने हुए हैं।

नीतियों का खुला उल्लंघन

हरियाणा सरकार की आउटसोर्स पॉलिसी 2015 और डेपुटेशन पॉलिसी साफ़ तौर पर कहती हैं कि ऐसे मामलों में समयसीमा और नियमों का पालन ज़रूरी है। लेकिन बैंस को 2016 में चंडीगढ़ प्रशासन से डेपुटेशन पर लाने के बाद लगातार बढ़ाया गया, फिर रिटायरमेंट के बाद अनुबंध और री-एम्प्लॉयमेंट पर भी रखा गया। यानी नियमों को ताक पर रखकर उन्हें लगातार पद और सुविधाएँ मिलती रहीं। सवाल यह है—क्या राजभवन इस एक व्यक्ति के बिना अधूरा है या फिर यह सत्ता का साफ़ दुरुपयोग है?

बेरोज़गार युवाओं के सवाल

राज्य में लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं और इंटरव्यू में पसीना बहा रहे हैं, लेकिन एक रिटायर्ड अफसर के लिए नियम रोज़ तोड़े जा रहे हैं। अगर री-एम्प्लॉयमेंट संभव है तो यह सुविधा सभी रिटायर्ड कर्मचारियों के लिए क्यों नहीं? क्या यह विशेषाधिकार सिर्फ़ ‘खास लोगों’ के लिए सुरक्षित है?

दोहरी व्यवस्था: आउटसोर्स बनाम वीआईपी

राजभवन में काम कर रहे आउटसोर्स कर्मचारी बिना किसी सुरक्षा या सुविधा के गुज़ारा कर रहे हैं—

• उन्हें डीए, एचआरए, मेडिकल सुविधा या पेड लीव तक नहीं मिलती।
• वहीं, बैंस जैसे रिटायर्ड अफसरों को पूरा वेतन, किरायामुक्त आवास/भत्ता, मेडिकल रिइम्बर्समेंट, मुफ्त बिजली-पानी और यात्रा-भत्ता सब मिलता है।

यह स्पष्ट भेदभाव कर्मचारियों की नाराज़गी को और गहरा कर रहा है।

भ्रष्टाचार की गहराई: डॉ. रांगा का मामला

यह कहानी सिर्फ़ बैंस तक सीमित नहीं। हाल ही में डॉ. सतीश रांगा को ओएसडी नियुक्त किया गया, जबकि उन्हें पहले भ्रष्टाचार के आरोपों में पद से हटाया गया था। अब वही अधिकारी दोबारा वापस लाए गए हैं। इससे साफ़ है कि राजभवन न सिर्फ़ नीतियों का उल्लंघन करता है, बल्कि भ्रष्ट अफसरों को भी ‘रीसायकल’ करके वापस जगह देता है।

  1. कर्मचारियों और युवाओं की मांगें

 आउटसोर्स और डेपुटेशन पॉलिसी का सख्ती से पालन हो।
• 65 वर्ष से ऊपर री-एम्प्लॉयमेंट पर रोक लगे।
• भ्रष्ट अफसरों की नियुक्ति तुरंत रद्द हो।
• युवाओं के लिए मेरिट और पारदर्शिता आधारित भर्ती व्यवस्था बने।

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