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क्या महाभियोग से पहले ज्ञानेश कुमार दोनों चुनाव आयुक्तों की कर सकते हैं छुट्टी? जानें मनमोहन सरकार का चावला केस

September 26, 2026 · Ashish Bajpai · 1 मिनट पढ़ें

Explainer: भारत के चुनाव आयोग में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से फैसलों और प्रक्रियाओं पर बार-बार लिखित आपत्ति जताए जाने की रिपोर्ट ने चुनावी व्यवस्था को लेकर नई ब…

Explainer: भारत के चुनाव आयोग में दो चुनाव आयुक्तों की ओर से फैसलों और प्रक्रियाओं पर बार-बार लिखित आपत्ति जताए जाने की रिपोर्ट ने चुनावी व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है. एक तरफ विपक्ष सीईसी के इस्तीफे की मांग करने के साथ महाभियोग लाने की बात कर रहा है तो अब दूसरी तरफ ये भी चर्चाएं तेज हो गई हैं कि खुद ज्ञानेश कुमार दोनों ईसी की छुट्टी कर सकते हैं. यानी उन्हें हटा सकते हैं. क्या ये संभव है तो इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान चावला केस समझना होगा

बता दें कि द इंडियन एक्सप्रेस की 23 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर आयोग के कुछ फैसलों या आदेशों पर आपत्ति दर्ज की. इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, Form-6 में बदलाव और चुनावी डेटा के प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं

रिपोर्ट सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए. वहीं, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA के कुछ सहयोगी दलों ने भी आयोग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने कहा कि अलग-अलग राय और टिप्पणियां किसी भी संस्थान की आंतरिक विचार-विमर्श प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और पिछले एक साल में आयोग के सभी अंतिम फैसले पूरी तरह सर्वसम्मति से लिए गए

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर गंभीर मतभेद सामने आते हैं तो इसका संवैधानिक और कानूनी असर क्या होता है

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों की निगरानी, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है. आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC और अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं. मौजूदा व्यवस्था में आयोग तीन सदस्यीय है

संविधान के अनुसार जब अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्त होते हैं तो CEC आयोग के चेयरमैन होते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में CEC अकेले फैसला कर सकते हैं

मौजूदा कानून में CEC को आमतौर पर ‘फर्स्ट एमॉन्ग इक्वल्स’ यानी बराबरों में प्रथम के तौर पर समझा जाता है. चुनाव आयोग एक सामूहिक संवैधानिक संस्था है

यहां अक्सर भ्रम पैदा होता है. CEC आयोग के चेयरमैन हैं और प्रशासनिक स्तर पर उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह बाकी दोनों आयुक्तों को दरकिनार कर अकेले आयोग का फैसला कर सकते हैं

सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 18 में है. इसके मुताबिक आयोग का काम जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए. अगर सदस्यों के बीच किसी विषय पर मतभेद हो तो फैसला बहुमत के आधार पर होगा

साथ ही आयोग अपनी कार्यप्रणाली और काम के बंटवारे को सर्वसम्मति से तय करता है. इसका सीधा अर्थ है कि तीन सदस्यों के आयोग में CEC की राय अपने आप अंतिम नहीं हो जाती

मसलन, यदि CEC और एक चुनाव आयुक्त किसी फैसले के पक्ष में हैं और तीसरा विरोध करता है, तो दो के मुकाबले एक का बहुमत होगा. लेकिन अगर CEC अकेले एक राय रखते हैं और दोनों चुनाव आयुक्त दूसरी राय पर हैं, तो मौजूदा बहुमत व्यवस्था में दोनों आयुक्तों की राय बहुमत मानी जाएगी

यही वजह है कि मौजूदा विवाद में केवल यह सवाल महत्वपूर्ण नहीं है कि किसने किस मुद्दे पर असहमति जताई, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि अंतिम फैसले किस प्रक्रिया से लिए गए

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्ति जताई. रिपोर्ट में बताया गया कि ये आपत्तियां नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, नाम बहाल करने, Form-6 और चुनावी डेटा के IT सिस्टम से जुड़े मामलों तक थीं

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में शिकायत की कि फैसले या निर्देश उनकी जानकारी या स्वीकृति के बिना जारी किए गए. एक अन्य मुद्दा चुनावी रोल के IT सिस्टम और उसके नियंत्रण से जुड़ा बताया गया

हालांकि इन दावों के जवाब में चुनाव आयोग ने अलग तस्वीर पेश की. आयोग ने कहा कि आंतरिक बैठकों में अलग-अलग राय रखना सामान्य है और रिपोर्ट में केवल कुछ आंतरिक टिप्पणियों को सामने रखा गया है, जबकि आयोग के अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए

इसलिए फिलहाल विवाद का एक अहम हिस्सा ‘लिखित आपत्तियां हुईं या नहीं’ से आगे बढ़कर ‘क्या उन आपत्तियों के बावजूद अंतिम फैसले पूरी संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिए गए?’ पर केंद्रित हो गया है

मामले में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम यह रहा कि NDA के कुछ सहयोगी दलों ने भी चुनाव आयोग से स्थिति स्पष्ट करने को कहा है

लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान, राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा और तेलुगु देशम पार्टी के नेता लावू श्रीकृष्ण देवरायालु ने अलग-अलग बयानों में चुनाव आयोग से लोगों के मन में पैदा हुए संदेह दूर करने की मांग की

उनका तर्क रहा कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर लोगों के बीच किसी तरह का संदेह पैदा होना संस्थागत विश्वास के लिहाज से महत्वपूर्ण विषय है. इससे विवाद का दायरा सिर्फ विपक्ष बनाम चुनाव आयोग की बहस तक सीमित नहीं रहा

यहीं पर संविधान की व्यवस्था को ठीक से समझना जरूरी है.संविधान के अनुच्छेद 324(5) और 2023 के कानून की धारा 11 के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधार पर सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है

दूसरी ओर, अन्य चुनाव आयुक्तों के मामले में व्यवस्था अलग है. उन्हें पद से हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश जरूरी है.यानी यह कहना सही नहीं होगा कि CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए एक ही प्रक्रिया है

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाना बेहद कठिन संवैधानिक प्रक्रिया है. इसकी तुलना सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया से की जाती है

सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए संसद में महाभियोग जैसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और हटाने का आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता होना चाहिए. यही सुरक्षा CEC को भी प्राप्त है

इसलिए केवल राजनीतिक असहमति, किसी फैसले पर विवाद या किसी रिपोर्ट में सामने आई प्रशासनिक आपत्ति अपने आप CEC को हटाने का आधार नहीं बनती

यही मौजूदा विवाद का सबसे जटिल संवैधानिक पहलू है.कानून स्पष्ट रूप से बताता है कि अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने की सिफारिश CEC कर सकते हैं. लेकिन अगर खुद CEC के खिलाफ दोनों अन्य चुनाव आयुक्त शिकायत या हटाने की मांग करें, तो ऐसी स्थिति के लिए संविधान में कोई समानांतर स्पष्ट प्रक्रिया नहीं दी गई है

यानी यहां कानूनी असमानता दिखाई देती है CEC के पास अन्य आयुक्तों के संबंध में एक विशेष भूमिका है, लेकिन अन्य आयुक्तों के पास CEC को उसी तरह हटाने की सिफारिश करने का प्रावधान नहीं है

ऐसी स्थिति में मामला संवैधानिक व्याख्या, न्यायिक समीक्षा या संसद द्वारा कानून में बदलाव की बहस की ओर जा सकता है

ऐसा विवाद पहले भी सामने आ चुका है. वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से की थी

गोपालस्वामी ने चावला के खिलाफ गंभीर आरोपों और उनके कथित राजनीतिक झुकाव से जुड़े मुद्दों को आधार बनाया था. जनवरी 2009 में उनकी सिफारिश राष्ट्रपति के पास पहुंची और इस मामले ने राजनीतिक एवं संवैधानिक बहस को जन्म दिया

राष्ट्रपति ने इस मामले पर सरकार से विचार-विमर्श किया और आखिरकार गोपालस्वामी की सिफारिश स्वीकार नहीं की गई. इसके बाद गोपालस्वामी अप्रैल 2009 में सेवानिवृत्त हो गए और नवीन चावला उनके उत्तराधिकारी के रूप में मुख्य चुनाव आयुक्त बने

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि CEC की सिफारिश अपने आप किसी चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के बराबर नहीं होती. संवैधानिक प्रक्रिया में राष्ट्रपति की भूमिका भी रहती है

भारत में किसी मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त को संसद की महाभियोग जैसी प्रक्रिया के जरिए पद से हटाए जाने का उदाहरण नहीं है

हालांकि, यहां फिर एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है. CEC को हटाने की प्रक्रिया महाभियोग जैसी है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों के लिए CEC की सिफारिश आवश्यक होती है.इसलिए दोनों पदों की सुरक्षा को एक जैसा बताना संवैधानिक स्थिति को सरल बनाकर पेश करना होगा

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा असर चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता और निर्णय लेने की पारदर्शिता पर पड़ने वाली बहस के रूप में देखा जा सकता है

एक तरफ आयोग कह रहा है कि अलग-अलग राय आंतरिक विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए. दूसरी तरफ रिपोर्ट में दो आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई बार-बार की लिखित आपत्तियां सामने आई हैं

इसलिए आगे तीन चीजें खास तौर पर महत्वपूर्ण होंगी पहला, इन आपत्तियों पर आयोग की विस्तृत सफाई; दूसरा, यह स्पष्ट होना कि विवादित फैसलों को आयोग के सभी सदस्यों की मंजूरी किस स्तर पर मिली; और तीसरा, यदि किसी निर्णय पर वास्तविक मतभेद था तो उसे 2023 के कानून में निर्धारित बहुमत और कार्यप्रणाली के अनुसार कैसे निपटाया गया

दरअसल यह विवाद केवल तीन अधिकारियों के बीच मतभेद का मामला नहीं है. चुनाव आयोग देश की चुनावी प्रक्रिया की संवैधानिक संस्था है. इसलिए उसके भीतर मतभेद होना अपने आप में असंवैधानिक नहीं है; असली सवाल यह है कि मतभेदों को दर्ज करने, उनका समाधान करने और अंतिम निर्णय लेने की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट, सामूहिक और कानून के अनुरूप है

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Source: NewsNation TV

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