उत्तर प्रदेश की समृद्ध कथक परंपरा को समर्पित दो दिवसीय ‘नमन’ समारोह ने लखनऊ में कला और संस्कृति की शानदार छटा बिखेरी। उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी और कथक केन्द्र, लखनऊ की ओर से सुविख्यात कथकाचार्य पं. लच्छू महाराज की स्मृति में आयोजित इस समारोह में देश के विभिन्न शहरों से आए ख्यातिप्राप्त कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कला संरक्षण एवं संवर्धन की नीति और संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित समारोह में कथक की पारंपरिक शैलियों, भाव, लय, ताल और अभिनय का अद्भुत संगम देखने को मिला। उद्घाटन अवसर पर पं. लच्छू महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
समारोह की पहली संध्या में कथक केन्द्र, लखनऊ की कलाकारों ने ‘नायिका प्रसंग’ के जरिए प्रेम, विरह, मान, प्रतीक्षा और मिलन जैसे भावों को कथक की भाषा में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। इसके बाद मीरा के लोकप्रिय भजन ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’ पर चक्कर, तिहाई, पदसंचालन और भावों से सजी प्रस्तुति ने खूब तालियां बटोरीं। ‘कृष्ण नमन’ में कृष्ण स्तुति, कवित्त, टुकड़े, तिहाई और परन के जरिए कथक की पारंपरिक भव्यता सामने आई।
पहली संध्या में पुणे की कथक नृत्यांगना आभा औटी ने गणेश वंदना से शुरुआत करते हुए साढ़े सात मात्रा की विशेष रचना ‘नील’, दोहे और उत्तर प्रदेश की होली परंपरा पर आधारित प्रस्तुति से दर्शकों की वाहवाही हासिल की। प्रयागराज की वरिष्ठ कथक नृत्यांगना उर्मिला शर्मा ने शिव वंदना और ठुमरी के माध्यम से कथक के पारंपरिक स्वरूप को जीवंत किया, जबकि अहमदाबाद के मौलिक शाह ने शिव स्तुति के बाद तीनताल में कथक और भावप्रधान ठुमरी प्रस्तुत की।
समारोह की दूसरी संध्या की शुरुआत कथक केन्द्र की ‘गुरु कृपा’ प्रस्तुति से हुई। इसके बाद लखनऊ की प्रतिष्ठित कथक गुरु एवं नृत्यांगना डॉ. रुचि खरे ने ध्रुपद अंग से प्रस्तुति का आगाज किया। राग मालकौंस में निबद्ध ‘शंकर अति प्रचंड’ ने वातावरण को आध्यात्मिक और ऊर्जावान बना दिया। ठाट, आमद, परन, यति, गत निकास और विभिन्न पारंपरिक बंदिशों के जरिए कथक की तकनीकी समृद्धि का प्रदर्शन हुआ।
डॉ. रुचि खरे और उनके शिष्यों ने अष्टपदी तथा 18 मात्रा की मत्त ताल में लयकारी और नृत्य-सौंदर्य का प्रभावी प्रदर्शन किया। अंत में ‘कोयलिया मत कर पुकार’ जैसे भावपूर्ण दादरा ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। संगीत, तबला, सारंगी, बांसुरी और सितार की संगत ने प्रस्तुतियों की खूबसूरती को और बढ़ाया।
इंदौर की डॉ. सुमित्रा हरमलकर ने गणेश स्तुति के बाद त्रिताल में ताल नर्तन प्रस्तुत किया, जिसमें रायगढ़ घराने की विशिष्ट बंदिशों की झलक देखने को मिली। सूरदास के पद पर आधारित अभिनय के साथ उनकी प्रस्तुति का समापन हुआ। इसके साथ ही पुणे के डॉ. नंदकिशोर कपोते और मेरठ की प्रो. (डॉ.) भावना ग्रोवर की प्रस्तुतियों ने भी दर्शकों की खूब सराहना बटोरी।
कथक की थाप, घुंघरुओं की झंकार और शास्त्रीय संगीत की मधुरता से सजे इस दो दिवसीय समारोह ने लखनऊ की सांस्कृतिक विरासत को एक बार फिर मंच पर जीवंत कर दिया। ‘नमन’ समारोह ने पं. लच्छू महाराज की स्मृति को नमन करते हुए कथक की गुरु-शिष्य परंपरा और भारतीय शास्त्रीय कला की निरंतरता का शानदार संदेश दिया।

