ब्राह्मण-ठाकुरों की हुंकार के आगे झुके चिराग! आरक्षण पर बदला सुर, बोले—सवर्णों के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा! आरक्षण के मुद्दे पर अब सियासत एक ऐसे मोड़ पर पहुं…
ब्राह्मण-ठाकुरों की हुंकार के आगे झुके चिराग! आरक्षण पर बदला सुर, बोले—सवर्णों के साथ अन्याय नहीं होने दूंगा! आरक्षण के मुद्दे पर अब सियासत एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां नेताओं के पुराने बयान और नए बयान आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। जिस चिराग पासवान का अब तक साफ कहना था कि आरक्षण में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए और आरक्षण कोई खैरात नहीं है, वही चिराग अब सामान्य जाति के भविष्य और अधिकारों की बात करते नजर आ रहे हैं।अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि चिराग पासवान को अपना सुर बदलना पड़ा? दरअसल, एक तरफ पार्टी के भीतर से इस्तीफों का सिलसिला और दूसरी तरफ बिहार के बड़े दलित नेता जीतन राम मांझी का खुला विरोध—चिराग पासवान के सामने सियासी दबाव लगातार बढ़ता गया। मांझी ने यहां तक कह दिया कि चिराग को इस्तीफा दे देना चाहिए और उनकी जगह उसी समाज के किसी दूसरे नेता को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। इतना ही नहीं, जीतन राम मांझी ने आरक्षण में वर्गीकरण और समीक्षा की वकालत की। उनका कहना था कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक भी पहुंचना चाहिए जो अभी तक इससे वंचित हैं।
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ओबीसी नेता ओमप्रकाश राजभर भी इसी तरह की बात कह चुके हैं कि आरक्षण का लाभ ले चुके संपन्न लोगों को अपने समाज के दूसरे जरूरतमंद भाइयों के लिए आगे आना चाहिए। और अब चिराग पासवान का नया बयान सियासी बहस को और गर्म कर रहा है। चिराग ने साफ कहा कि आरक्षण खत्म नहीं होना चाहिए, लेकिन सामान्य वर्ग के बच्चों के भविष्य और उनके अधिकारों की सुरक्षा के लिए भी सरकार को उपाय करने चाहिए। उन्होंने सामान्य जाति के नेताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब वह अपने समाज के साथ खड़े हैं, तो सामान्य जाति के नेताओं को भी अपने समाज के साथ खड़ा होना चाहिए। चिराग ने यहां तक कहा कि वह सामान्य जाति के साथ खड़े हैं और उनके साथ अन्याय नहीं होने देंगे। साथ ही उन्होंने कहा कि अलग-अलग वर्गों के लोगों को अपने बच्चों और समाज के भविष्य की चिंता है और इस चिंता का समाधान संवाद के जरिए होना चाहिए। यानी पहली बार चिराग के बयान में सामान्य वर्ग के आक्रोश और चिंता की खुली स्वीकारोक्ति दिखाई दे रही है। क्योंकि सवाल अब सिर्फ आरक्षण का नहीं है। सवाल यह है कि अगर दलित, पिछड़े और दूसरे समाज के नेता अपने-अपने समाज के मुद्दों पर खुलकर बोल सकते हैं, तो सामान्य जाति के बड़े नेता आखिर चुप क्यों हैं? यही चुप्पी अब ब्राह्मण और ठाकुर समाज के भीतर नाराजगी बढ़ा रही है। कहीं नेताओं की शवयात्रा निकाली जा रही है, तो कहीं पिंडदान तक किया जा रहा है। और सबसे बड़ा सवाल बीजेपी के लिए है—अगर यह नाराजगी 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव तक जारी रही, तो क्या उसका सबसे पुराना और परंपरागत समर्थन आधार उससे दूरी बनाना शुरू कर देगा? क्योंकि 2027 यूपी और 2029 लोकसभा से पहले सामान्य वर्ग की यह नाराजगी बीजेपी के लिए बड़ा सियासी इम्तिहान बनती दिखाई दे रही है।
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Source: Filmitics

