आरक्षण के मुद्दे पर देश में ऐसा सियासी विस्फोट हुआ है, जिसकी तपिश अब बीजेपी के अपने ही सहयोगी दलों तक पहुंच गई है… क्योंकि ओम प्रकाश राजभर के बाद अब संजय निषाद…
आरक्षण के मुद्दे पर देश में ऐसा सियासी विस्फोट हुआ है, जिसकी तपिश अब बीजेपी के अपने ही सहयोगी दलों तक पहुंच गई है… क्योंकि ओम प्रकाश राजभर के बाद अब संजय निषाद ने भी आरक्षण के भीतर बदलाव की हुंकार भर दी है। संजय निषाद के बयान ने सीधे उस बहस को हवा दे दी है, जिस पर देश की राजनीति लंबे समय से दो हिस्सों में बंटी हुई है। उन्होंने साफ कहा कि जो लोग विधायक, सांसद, आईएएस, आईपीएस और बड़े पदों तक पहुंच चुके हैं, उन्हें अब आरक्षण का लाभ छोड़ देना चाहिए और इसका फायदा उन गरीब और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचना चाहिए, जो आज भी इससे वंचित हैं। यानी सवाल अब सिर्फ ये नहीं है कि आरक्षण रहे या नहीं रहे… सवाल ये बन गया है कि आरक्षण का फायदा आखिर किसे मिले?
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एक तरफ सामान्य वर्ग आरक्षण व्यवस्था में बदलाव और समीक्षा की मांग को लेकर लगातार आवाज बुलंद कर रहा है… दूसरी तरफ आरक्षित वर्ग के भीतर से भी अब ऐसी आवाजें उठ रही हैं, जो कह रही हैं कि दशकों बाद व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है। और यहीं से बीजेपी की सबसे बड़ी राजनीतिक मुश्किल शुरू होती दिखाई दे रही है। क्योंकि एक तरफ बीजेपी के सहयोगी दल ही वर्गीकरण और क्रीमी लेयर की मांग उठा रहे हैं, तो दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद, मायावती और चिराग पासवान जैसे नेता आरक्षण में किसी बदलाव का विरोध करते दिखाई दे रहे हैं। यानी आरक्षण के मुद्दे पर सिर्फ विपक्ष और सत्ता पक्ष ही आमने-सामने नहीं हैं… बल्कि सियासी दलों के भीतर और आरक्षित वर्ग के बीच भी बड़ी खाई दिखाई देने लगी है। पहले जीतन राम मांझी, फिर ओम प्रकाश राजभर और अब संजय निषाद… आखिर क्यों लगातार सहयोगी दल आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं? क्या देश में आरक्षण को लेकर एक नई राजनीतिक लड़ाई शुरू हो चुकी है? क्या वर्गीकरण और क्रीमी लेयर आने वाले चुनावों में बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है? और सबसे बड़ा सवाल—अगर आरक्षण के लाभ को लेकर आरक्षित वर्ग के भीतर ही आवाजें उठने लगीं, तो बीजेपी और मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी? फिलहाल आरक्षण की आग बुझती नहीं दिख रही… बल्कि हर नए बयान के साथ इसकी तपिश बढ़ती जा रही है। अब देखना होगा कि ये लड़ाई सिर्फ बयानबाजी तक रहती है या आने वाले चुनाव में बड़ा सियासी विस्फोट करती है।
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Source: Filmitics

