आईआईसी दिल्ली में शिव कुमार शिव जी को श्रद्धांजलिरू प्रज्ञा को ‘काठ के पुतले’ और सविता पाठक को ‘कौन देस उतरने का’ पर सम्मान

नयी दिल्ली इंडिया इंटेरनेश्नल सेंटर, दिल्ली में किस्सा पत्रिका परिवार द्वारा वरिष्ठ साहित्यकार, आलोचक, और संस्कृतिकर्मी शिव कुमार शिव जी की स्मृति में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य साहित्यकार के अनुपम योगदान का स्मरण करना और मानवीय मूल्यों, जनचेतना एवं लोक के प्रश्नों से जूझती कलमों को सम्मानित कर प्रोत्साहित करना था। समकालीन चर्चित कथाकार प्रज्ञा को 2025 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह ‘काठ के पुतले’ व सविता पाठक को उनके उपन्यास “कौन देस उतरने का” के लिए ‘शिव कुमार शिव स्मृति सम्मान -26″ प्रदान किया गया। इस अवसर पर राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित शिव कुमार शिव जी की “प्रतिनिधि कहानियाँ” का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया ने की। वरिष्ठ साहित्यकार, विचारक, चिंतक पुरुषोत्तम अग्रवाल कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। ग्रामीण संवेदना के चितेरे वरिष्ठ साहित्यकार महेश कटारे एवं वरिष्ठ साहित्यकार-संपादक लीला धर मांडलोई प्रमुख वक्ता थे। कार्यक्रम का प्रारंभ शिव कुमार शिव जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित डॉक्यूमेंटरी से हुआ। जिसमें उनके अपनी मिट्टी भागलपुर के प्रति प्रेम, मानवीय मूल्यों के प्रति जिद, और साहित्यिक चेतना के प्रति जुझारूपन के दिग्दर्शन ही नहीं हुए बल्कि उनके पारिवारिक मूल्यों का भी बारीकी से रेखांकन हुआ। ये एक ऐसा क्षण था जब पूरा सभागार भावुक हो गया। तत्पश्चात अतिथियों को मंच पर बुलाकर कार्यक्रम का विधिवत आरंभ किया गया। किस्सा पत्रिका की प्रबंध संपादक मीनाक्षी सिंघानिया ने कार्यक्रम की अध्यक्ष ममता कालिया का व आनंद सिंघानिया ने मुख्य अतिथि पुरुषोत्तम अग्रवाल का दुशाला व फूलों के गुलदस्ते से स्वागत किया। मुख्य वक्ता महेश कटारे, लीलाधर मांडलोई, कथाकार सविता और प्रज्ञा का स्वागत क्रमशरू सक्षम भारद्वाज, आनंद सिंघानिया , और मीनाक्षी सिंघानिया ने किया। मीनाक्षी सिंघानिया ने स्वागत भाषण से अतिथियों का स्वागत किया और किस्सा पत्रिका की संपादक अनामिका शिव के पिता को लिखे गए पत्र का पाठ भी किया। इस भावुक पत्र की शुरुआत अनामिका ने ‘पा’ सम्बोधन के साथ की। वे अपने पिता को ‘पा’ कह कर ही संबोधित करती थीं। इस पत्र ने पिता पुत्री के स्नेह को ही प्रदर्शित नहीं किया बल्कि यह भी सिद्ध किया कि समता समानता की नींव से रचे गए घरों की बेटियाँ विरासतें संभालती हैं और बहुए बहनों की तरह हाथ मिलाकर साथ चलती है। कार्यक्रम का अगला भाग राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित शिव कुमार शिव जी की “प्रतिनिधि कहानियाँ” पुस्तक के लोकार्पण के नाम रहा। ममता कालिया जी, पुरुषोत्तम अग्रवाल , महेश कटारे, लीलाधार मांडलोई, कथाकार प्रज्ञा, सविता पाठक एवं राजकमल प्रकाशन समूह के आमोद माहेश्वरी व अशोक माहेश्वरी ने करतल ध्वनि के मध्य पुस्तक को पाठकों को समर्पित किया। वरिष्ठ साहित्यकार महेश कटारे ने शिव कुमार शिव जी की कहानियों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उनके वक्तव्य में मित्रवत स्नेह, संवेदनाओं की सुवास, और साहित्यकाश के साथ-साथ निजी जीवन में उपजे खालीपन का दर्द भी स्पष्ट रूप से दिख रहा था। उन्होंने उनकी किस्सागोई की प्रशंसा करते हुए कहा कि, वे अपनी कहानियों के पात्र कल्पना से नहीं उठाते थे उनकी कहानियों के पात्र रोजमर्रा के जीवन से टकराने वाले लोग हैं। उनकी कहानियों में प्रेम और देह जरूरी बिन्दु हैं, लेकिन वे कलात्मकता के साथ आते थे न कि किसी फूहड़पन या अश्लीलता के साथ। सहज भाषा में लिखी गई उनकी कहानियों के बारे में अपनी बात रखते हुए उन्होंने आगे कहा कि शिव कुमार शिव जी की की कहानियों में मौन चीत्कार, उदासियों और हाहाकार की एक भीषण दुनिया बसी होती है। जिनको पढऩे के पश्चात पाठक सहज नहीं रह पाता है। सामाजिक असमानताओं के प्रश्नों को पाठकों के मन में बो देना ही उनकी कहानियों की जीत है। पुरस्कृत कथाकारों कि कहानियों पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि दोनों ही कथाकारों की कहानियाँ दिल्ली की उन बस्तियों से होकर गुजरती हैं जिन्हें विकास की चमक से चुँधियाई आँखें अक्सर देख नहीं पाती हैं। सविता पाठक के उपन्यास “कौन से देस उतरने का” पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि ये देश के गाँवों से रोजी रोटी की तलाश में शहर आए लोगों की मार्मिक कथा है। ये अपने ही देश में विस्थापित हैं। इनका जीवन समाजिक व्यवस्था और राज्य व्यवस्था का मारा हुआ जीवन है। इनकी एक ही जाति है ‘गरीबी’। महिलाओं पर तो पितृसत्ता का दोगुना बोझ है। लोक भाषा और लोक रंग में रंगी कथा सोचने पर विवश कर देती है। कथाकार प्रज्ञा की कहानियों पर अपना मन्तव्य रखते हुए उन्होंने कहा कि वे उनकी कथाएँ पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ते रहे हैं। ‘मन्नत टेलर’ का जिक्र करते हुए प्रज्ञा की कहानियों में समाज के दमित, शोषित वर्ग के लिए शाइस्तगी से एक गंभीर आवाज उठती है। वे समाज के अंधेरे कोनों को दिखाती ही नहीं बल्कि परिवर्तन की एक किरण भी थमाती हैं। बेचौन परिस्थितियों से संघर्ष करते उनके पात्र आशा की मशाल थामे रखते हैं।









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